Sunday, July 24, 2011

कवि-सृष्टि


कवि की यह सृष्टि अलौकिक
यहाँ शशकशृंग भी होता है ।
चकवी के वियोग में चकवा
सदा यहाँ पर रोता है ॥
दूर कहीं गगनाञ्चल में,
आकाशकुसुम भी यही खिलाते,
जब भी कोई बच्चा रोता,
चन्दामामा पास बुलाते।
देखो कवि-कल्पना अलौकिक,
कृत्रिम होकर भी है मौलिक।
ये आग से सिंचन करते,
आकाशमार्ग से प्रवचन करते।
नहीं यहाँ कुछ भी असम्भव,
दरिद्र नारायण, कुबेर का वैभव ॥
काव्यलोक कल्पना से इनकी,
निशिदिन सज्जित होता है ।
निर्धन की कुटिया में भी,
प्रासाद अलंकृत होता है ॥
यहाँ पर कोयल सदा कूजती,
आकाश निहारता चातक है ।
करुणा में भी आनन्द यहाँ,
करुण-रस आह्लादक है ॥

9 comments:

Saru Singhal said...

Bahut Sundar!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

कवि की सिष्टि सच ही अलौकिक होती है सुन्दर प्रस्तुति

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आज 25- 07- 2011 को आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....


...आज के कुछ खास चिट्ठे ...आपकी नज़र .तेताला पर
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vidhya said...

बहुत सुन्दर

वन्दना said...

्बहुत सुन्दर भाव संग्रहण्।

वाणी गीत said...

कवि की कल्पना में भी यथार्थ होता है ...
सुन्दर कविता !

Rakesh Kumar said...

वाह! बहुत सुन्दर प्रस्तुति है.

आप मेरे ब्लॉग पर आये,इसके लिए बहुत बहुत आभार.समय मिलने पर फिर से आईयेगा.
आपका हार्दिक स्वागत है.

नवरात्रि पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ.

fija said...

बहुत सुन्दर ,
aap jaise logo ne hi hindi kavita aur sahitya ko jivit rakha hai , aap ko mera salam

विपुल said...

अति सुंदर! मन प्रसन्न हो गया