Thursday, January 18, 2018

वो... रेनू वर्मा

वो मेरे घर की गलियां
वो मेरे बाग़ की ठंडी हवा
वो मेरे छत की तारों वाली झिलमिल रातें 
वो मेरे शहर की सडकों पर चलती गाड़ियों का शोर
वो दोस्तों के साथ घूमना
वो माँ के डर से घर जल्दी जाने की ज़िद करना
वो पापा की डांट से बचने के लिए किताब लेके बैठना
वो भाई बहनों के साथ झगड़ना 
वो वक़्त बीत गया
वो समां गुज़र गया 
हम भी आगे बढ़ गए
और ज़माना भी आगे बढ़ गया
अब बस यादें रह गयी हैं
जो भुलाई नहीं जाती हैं। 

Wednesday, January 17, 2018

आयशा: सपना मांगलिक

आयशा
वो कहते हैं कि औरत
कभी हो नहीं सकती बच्ची 
अरे वो तो महज एक 
जमीन है कच्ची 
जिसपे जो चाहे ,जब चाहे
जोते हल,और चुक जाए तो दे दे अन्य किसी मेहनतकश को लीज पर 
या उगाता जाए फसल पर फसल
वो साठ की उम्र में भी पुरुष 
तू छः की नन्ही सी उम्र में भी औरत
तू नहा धोकर भी रस्ते की ख़ाक,नापाक
वो तेरे जिस्म से बुजु कर भी कहलाता है  पाक
वो पढ़ेगा अपने फायदे के लिए आयतें 
मगर तुझको ताउम्र करनी है
इस जल्लाद की इबादतें
उसके लिए बख्शी जाएंगी बहत्तर हूर
छीन लिए जाएंगे तुझसे 
तमाम सपने,हसरतें और नूर 
वो ढांप देगा तेरी पहचान स्याह हिजाब के पीछे
छुपायेगा वहशियत अपनी 
एक  किताब के नीचे
कर तुझे हलाला कभी सुनाकर तलाक
भोगेगें हर तरह से जिस्म तेरा
अल्लाह के ये बन्दे चालाक
बहुत हुआ आयशा तू बढ़ आगे 
रौंद डाल इस गुनहगार मरद जात को
थाम ले हाथ में कलम और किताब को
छोड़ इन झूठे सभी रस्म ओ रिवाज को
ख़ौफ़ज़दा करती जेहादी आवाज को
देख वो आफताब जो तेरा भी है 
तेरी है शब् ,तेरा सवेरा भी है 
नहीं गर्दिश , सितारे  सारे आसमान हैं 
जीती जागती  हाँ तू भी इंसान है
 तुझसे ही जहां यह ,तू ही जहान है 
तेरी भी एक अलग ,खुद की पहचान है। 
तू बेजान नहीं आयशा 
नहीं ,नहीं ,नहीं 
धड़कता है  एक दिल तुझमे भी 
बसती तुझमे भी जान है 
-
सपना मांगलिक

Friday, January 12, 2018

ख्वाहिशें : नेहा शर्मा

 ख्वाहिशें अनंत है
कभी कुछ तो कभी कुछ 
जिंदगी से मांगती 
हर पल मन में भागती
अभी ये चाहिए
अभी वो चाहिए
कभी समझ नही आया 
असल मे क्या चाहिए
संतुष्टि कभी हुई नही
इच्छा पूरी हुई नही
फिर भी ख्वाहिशें
बोझ बनकर कंधो पर लटक रही है
बोझ बनकर भटक रही है
खुद के साये की तरह चिपकी हुई
मन के कोने में दुबकी हुई
बेमतलब सी ख्वाहिशें
बिन बात की ख्वाहिशें 
कभी न पूरी होने वाली ख्वाहिशें
अक्सर कमजोर बना जाती है
फिर भी ख्वाहिशे 
अंत तक पीछे भागती है
ये ख्वाहिशें 
-नेहा शर्मा

Wednesday, January 3, 2018

निर्भीक पथिक : अभिषेक पाराशर

निर्भीक पथिक कंटक पथ पर बढ़कर संत्रस्त नहीं होता है,
क्षुधा भी उसका करती क्या ? जब वह लक्ष्य साध लेता है,
कंटक पथ परवर्तित हो जाता है फूलों की पंखुड़ियों में,
सदा विजय नतमस्तक होती है, उस नर के चरणों में ॥1॥
लक्ष्य वृहद हो या लघु हो,धैर्य कभी नहीं कम होता है,
वाद क्षेत्र में यदि घिर जाने पर,प्रतिवाद कभी नहीं कम होता है,
स्पर्श न करती निराशा उसको,विषम क्षण की घड़ियों में,
सदा विजय नतमस्तक होती है, उस नर के चरणों में ॥2॥
हार विजय में परिवर्तित होकर गले में हार डाल देती है,
बढ़कर वह उस मानव के हित नव पुरुषार्थ भेंट देती है,
पुरुषार्थ की आग उभर आती है, उसकी धमनियों में,
सदा विजय नतमस्तक होती है, उस नर के चरणों में ॥3॥
पथ पर रखता है जब वह पग, लक्ष्य की ही प्रत्याशा में,
लक्ष्य-लक्ष्य ही देखे वह, जब विजय की ही अभिलाषा में,
विजय खोलती अवरुद्ध मार्ग को,जुड़ता इतिहास की कड़ियों में
सदा विजय नतमस्तक होती है, उस नर के चरणों में ॥4॥
अभिषेक पाराशर 

Tuesday, January 2, 2018

नया साल में रखो प्रकृति का ख़्याल : सुशील कुमार वर्मा

ले उड़े इस जहाँ से बेरोजगारी और गरीबी,
एक हवा इस नये साल में!!
हर शिक्षित को रोजगार मिले, 
हो यही मेहरबानी इस नये साल में!!
शिक्षा को हर समय बढ़ावा देना, 
निवेदन है शासन-प्रशासन से इस नये साल में!! 
जल का कभी दुरुपयोग ना करना, 
वरना खतरे की घण्टी बज जाएगी इस नये साल में!! 
वायू को दूषित ना करना,
वरना दिल्ली जैसी फिर घटना होगी इस नये साल में!!
पर्यावरण से खिलवाड़ ना करना मानव, 
गुज़ारिश है मेरी इस नये साल में!! 
प्रकृति से दोस्ती करना, 
तब बनेगी बात इस नये साल में!! 
देश को आतंक से बचाना, 
कोई आतंकी दामन ना छू पाये भारत को इस नये साल में!!
आपका नववर्ष मंगलमय हो, 
विनती है "सुशील" की भगवान से इस नये साल में!!
       सुशील कुमार वर्मा 
     सिन्दुरियां-महराजगंज 
     गोरखपुर विश्वविद्यालय

Friday, December 29, 2017

हमारा किसान : रत्ना पाण्डेय

कुछ कर रहे हैं ऐश यहाँ बिना मेहनत के ही,
लाखों कमा रहे हैं महफ़िल जमा रहे हैं,
ज़िन्दगी का लुत्फ उठा रहे हैं ।
लेकिन मिट्टी में सोना उगाने वाले,
अपने तन को धूप में झुलसाने वाले,
देश को रोटी खिलाने वाले,
इतनी मेहनत के बावजूद भी कर्जा चुका रहे हैं ,
अपना ख़ून पसीना बहा रहे हैं ।
मिल जायेगा उनका पसीना एक दिन मिट्टी में,
किंतु ख़ून उनका बाकी रहेगा,
उनके अंश के रूप में पलता रहेगा ।
नहीं करेगा वह कभी हिम्मत फिर हल चलाने की,
काँप जायेगा उसका सीना उस हल को उठाने में ।
नहीं भूलेगा वह दर्द जो कभी उसके पिता ने सहा था,
और वह पिता की बांहों के बिना ही पला था ।
देखकर ऐसा भविष्य कौन फिर हल उठायेगा,
कौन अपना पसीना यूं ही बहायेगा ।
धीरे धीरे ये ही मौसम चल पड़ेगा,
किसान का बेटा फिर शहर की ओर निकल पड़ेगा ।
ज़रा सोचो कल्पना करो अपने भविष्य की,
दो वक़्त की रोटी भी तब मुश्किल पड़ेगी,
जब ऐसी हवा चलेगी ।
दे दो सारे हक़ उन्हें अधिकार उन्हें,
ताकि उनका ख़ून पसीना सिर्फ मिट्टी में ना मिले,
बल्कि हरियाली और खुशहाली बन के निकले ।
तभी यह देश खुशहाल होगा,
जब हर किसान यहाँ बराबरी का हकदार होगा ।
जब हर किसान यहाँ बराबरी का हकदार होगा ।

-रत्ना पांडे

नयी शुरुआत.. रेनू वर्मा

सर्द लहरें भयानक तूफान,
जीने की जदोजहद, डूबते अरमान 

कुछ अनकहे शब्द, कुछ अनसुलझे सवाल 
खुद को खोने का गम, सब कुछ ख़तम होने का एहसास 

सब जाना पहचाना, सब अनजान सा लगता है 
क्यों लगता है बहुत कुछ बीत गया, अब थम जाना चाहिए 

वक़्त भी रुक गया है और मैं भी रुक गयी हूँ 
ये अंत है या कोई नयी शुरुआत.