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Friday, May 1, 2020

एक दीया किसानों को! यमुना धर त्रिपाठी

प्रतिपल वह श्रम करता है,
कभी नहीं वह थकता है,
ग्रीष्म, शीत, वर्षा को सह,
चूते छप्पर के नीचे रह,
हालत उसकी पहचानो तो,
एक दीया किसानों को।

जीवन के झंझावातों को,
सह लेता है हो नीरव,
परती खेती का वक्ष चीर,
परहित करता है परमवीर,
उसकी व्यथा को जानो तो,
एक दीया किसानों को।

फटे-पुराने पहन वसन,
अभिलाषा का करके हनन,
सघन क्षेत्र हो या निर्जन,
ग्रीष्म, शरद हो या वर्षण,
काया करती जो स्वेद-त्याग,
मेघ गरजकर जाते भाग,
झुककर चुनता प्रति दानों को,
एक दीया किसानों को।

सुखी रोटी और चने चबा,
सार्वजनिक करता नहीं व्यथा,
करता रहता अनवरत श्रम,
चिंतित रहता है हरदम,
फसलों का करता है सींचन,
अच्छी खेती का कर चिंतन,
उसकी बातों को मानो तो,
एक दीया किसानों को।

-यमुना धर त्रिपाठी

मई अंक 

Saturday, April 25, 2020

तीन कविताएँ : अर्चना मिश्रा

सब ढूंढते मजहब
मैं ढूंढता रोटी,
कोई है शीश महलों में
मेरी तो छत टपकती है,
तुम्हें तो छाँव झुलसाती
मिले मुझे धूप में मोती,
तुम्हारे भोग हैं छप्पन
मैं कंकड़ पकाता हूँ,
तुम्हारी बिस्लरी बोतल
मेरा मटके का पानी है,
तुम्हें ए.सी. की ठंडक है
मुझे तो ओस सहलाती,
तुम शावर नहाते हो
मुझे वर्षा की रिमझिम है,
तुम्हें सर्दी में हीटर है
मुझे सूरज ये गुनगुन है,
तुम्हारे मखमली बिस्तर
मेरा धरती बिछौना है,
तुम्हें सुविधा के सपने हैं
मुझे मेहनत सुलाती है।
                           

2.

व्यथित हुआ क्यों मन के मीत
हैं बड़े मधुर जीवन के गीत
चंचल चंद्र की ललित कलाएँ
बढ़ती घटती फिर बढ़ती जाँए
रजनी में राजा सा खिलता
किंतु प्रात: रंक सा ढलता
क्या मानी उसने हार या जीत
व्यथित हुआ क्यों मन के मीत
विटप कभी पुष्पज को धरते
श्रृंगार कभी फूलों का करते
कुम्भला कर सब धरा पे गिरते
फिर पर्णी नव कोपल  सजते
तरुवर के क्या हृदय में पीर
व्यथित हुआ क्यों मन के मीत
तटिनी सबका पोषण करती
कल कल कल बहती रहती
कभी धरा जलमग्न है करती
भूमि में उर्वरता भरती
जलमाला फिर भी न रुकती
व्यथित हुआ क्यों मन के मीत
हैं बड़े मधुर जीवन के गीत
दिनकर की है लालिमा
नव्य रश्मि की कोमलता
स्वच्छंद गगन की उन्मुकता
पुहुप लिए ज्यों कोमलता
झंकार सांस ये जीवन गीत
व्यथित हुआ क्यों मन के मीत।

3.

हृदय आज उठा मचल
देख गगन पनघट पर
चन्द्र की गागर हिलोर
तारे मनहुं हुए जलज
नव दल, नव पुष्प कमल
नव प्रभात किरण नवल
गूंज उठा खगकुल चहल
महक उठा विश्व महल
ओस की ज्यों बूंद सजी
सुमन के जा माथ लगी
भ्रमर करे गूंज गीत
कलियन की तंद्रा टूटि
मोर नृत्य मग्न हुआ
कोकिल ने कूक किया
नभ में नव भानु उदित
अर्चना को थाल सजित
हृदय आज उठा मचल
नव जीवन, नवल जगत
नव शक्ति, हृदय नवल
नवल रश्मि, नव प्रभात
तरुवर के नवल पात
नैन आज हुए सजल
हृदय आज उठा मचल।।
                            अर्चना मिश्रा
अप्रैल अंक 

Thursday, April 23, 2020

राम काज में व्यस्त हूँ! यमुना धर त्रिपाठी

राम काज में व्यस्त हूँ!


मौन हूँ,
प्रसन्न हूँ,
स्वयं में ही मस्त हूँ,
राम काज में व्यस्त हूं!

निःशब्द हूँ,
निर्द्वन्द्व हूँ,
भविष्य से आश्वस्त हूँ,
राम काज में व्यस्त हूँ!

स्वानन्द हूँ,
स्वच्छंद हूँ,
स्वयं ही विश्वस्त हूँ,
राम काज में व्यस्त हूँ!

स्वतंत्र हूँ,
गणतंत्र हूँ,
स्वयं का महत्व हूँ,
राम काज में व्यस्त हूँ!

सजीव हूँ,
सुगन्ध हूँ,
प्रकृति का ही तत्व हूँ,
राम काज में व्यस्त हूँ!

साकार हूँ,
सभार हूँ,
धातु का तारत्व हूँ,
राम काज में व्यस्त हूँ!

अनुबन्ध हूँ,
अवतार हूँ,
जनमानस का अपनत्व हूँ,
राम काज में व्यस्त हूँ!

©यमुना धर त्रिपाठी
PGT हिंदी एवं संस्कृत
बरोडा पब्लिक स्कूल
वड़ोदरा, गुजरात।

अप्रैल अंक 

Saturday, April 11, 2020

मूल : ममता त्रिपाठी

सरल नहीं है
मूल को भूलना। 
सरल है यह भ्रम पालना
भूल गये हैं मूल को
पर फुनगी पर चढ़कर भी
पुलई पर खिलकर भी
मूल से आना पड़ता है
मूल तक आना पड़ता है।
मूल पर झड़कर।
मूल ही बन जाना पड़ता है।
पर जीवन को
जीने के लिए
सुख को खोजने
और पालने के लिए
पालना पड़ता है भ्रम
मूल को भूलने का।
उसके अस्तित्वबोध को
नकारने का।
@ममता त्रिपाठी 

Friday, April 10, 2020

जीवन प्रवाह : ममता त्रिपाठी

जीवन है
एक प्रवाह
सूक्ष्म से स्थूल
स्थूल से सूक्ष्म
एक चक्र है
लघु से गुरु
गुरु से लघु
समस्या तभी
आती है
जब हम
अपने गुरुत्व में
लघु को
भूल जाते हैं
स्थूल के महाकाया में
खोकर
सूक्ष्म को
अनदेखा करते हैं।
जब कर्म को
केवल
कर्मेन्द्रियों तक
समेटते हैं
और
ज्ञानेन्द्रियों की
विषयों के प्रति
गति को
समझना नहीं चाहते।
जब केवल
साक्षी के साक्ष्य पर ही
अपराधों को
अपराध समझते हैं 
प्रज्ञापराध पर
लम्बी चुप्पी
गहन मौन
साध लेते हैं।
अब बताइये कि
भला कौन
दहन होगा
उस आग में
जिसे अंतस् में
पालकर हम
प्रशांत दिखते हुये
सभ्य बने हुये हैं।
एक दिन
उठेगी ही
वह ज्वाला
जिसकी आज हम
आग लिये बैठे हैं।
#ममतात्रिपाठी

पलाश :- ममता त्रिपाठी

ग्रीष्म में दहकते वनों की
शोभा पलाश
चट्टानों में, वीरानों में
एकाकी हो खिलते पलाश
सूख चुकी आशाओं में
तुम जंगल की आग बन
फिरते पलाश
मृत-आशाओं की
जिजीविषा तुम
तुम्हीं नव-आस
जंगल के एकाकी पलाश।
तुम घोर रुदन में
मधुर हास
बुझती जिजीविषाओं के
जीवन-प्रकाश।
तुम निर्जन प्रकृति के
मुक्त हास।
तुम शुष्क भूमि के
जीवन-आधार।
तुम नैराश्य उदधि के
आशान्वित पतवार।
तुम उगते हो, तुम खिलते हो
एकाकी ही शत-शत बार।
शुष्क हो रहे वन-विटपों में
तुमसे ही वासंती बयार।

डॉ. ममता त्रिपाठी 

Monday, December 27, 2010

वन्दनीय


वन्दनीय वह निष्कम्प दीप है,
जो झंझावातों में जलता।
वन्दनीय शाश्वत प्रदीप है,
जो जगती का तम हरता।
वन्दनीय वह सागर-सीप है
गर्भ में जिसके मोती पलता।
अभिनन्दनीय वह मानस भी है
जो इन्हें स्नेह से सींचा करता।।