Tuesday, November 12, 2013

कब तक मनाऊँ मैं..................आनन्द मूर्ति

कब तक मनाऊँ मैं, वो अक्सर रूठ जाते हैं|
गर्दिश में अक्सर.... हर सहारे छूट जाते हैं|1
 मनाने का सलीका है, रिझाने का तरीका है|
मनाते ही मनाते वो........ अक्सर  रूठ जाते है|2
संजोकर दिल में रखता हूँ,नजर को खूब पढ़ता हूँ|
मगर खास होते ही,....अक्सर नजारे छूट जाते हैं|3
आईना समझकर हम.., उन्ही को देख जाते हैं|
संभालने की ही कोशिश में,जो अक्सर टूट जाते हैं|4
सब्र करता हूँ कि मेरे शब्दों में खामी हैं |
नारी अनबन से घरों में,अक्सर मुहारे फ़ूट जाते हैं|5
कब तक मनाऊँ मैं, वो अक्सर रूठ जाते हैं|
पढ़कर हमीं को ,दोस्त पुराने लूट जाते हैं|6
कब तक मनाऊँ मैं..............................

बातों ही बातों में वो मेरा दिल तोड़ जाते हैं|
भंवर में देखकर मुझको अकेला छोड़ जाते हैं|
कभी होठों की शरारत से,कभी नयनों की विरासत से|
लगा के आग सीने में वो...... जलता छोड़ जाते हैं|
कैसे बताए हम कि तुमसे प्यार करते हैं|
जुवाँ पर नाम आते ही वो मुद्दा मोड़ जाते हैं|...


अक्टूबर अंक
आनन्द मूर्ति
बिलासपुर,छत्तीसगढ


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