Tuesday, November 12, 2013

महफूज..................पल्लव

माँ !
मैं बहुत खुश हूँ
यहाँ तुम्हारे अंदर...
सुखीसुरक्षितनिर्भीक
और स्वतन्त्र भी.
ले सकती हूँ
अपनी मर्जी की साँसें
यहाँ मेरे लिए
कोई बंदिश भी नहीं है
फैला सकती हूँ पंखें
उड़ सकती हूँ निर्बाध.
दूर-दूर तक नहीं है यहाँ 
घृणित मानसिकता की
घूरती आँखें
आदमजात की खालों में
पशुओं की घातें.
महफूज हूँ उन खतरों से भी
जिससे तुम्हें हर रोज वाकिफ
होना पड़ता है
मेरी दुनियाँ छोटी ही सही पर
तुम्हारी दुनिया जितनी
स्याह और विषैली नहीं है...

अक्टूबर अंक

पल्लव
इंद्रा पार्क,उत्तमनगर ईस्ट
नई दिल्ली

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