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Thursday, April 16, 2020

प्रकृति माँ - सरोजिनी पाण्डेय



एक बात बतानी है तुमको, 
एक कथा सुनानी है सबको 

बचपन यदि नटखट होता है 
माता से दंडित होता है ,
संतति को गुणी बनाने का 
जिम्मा माता का होता है। 

जननी होती है धैर्यवान्  
वह शिशु पर स्नेह लुटाती है, 
पर बहुत अधिक नटखटपन से
वह श्रमित -क्लांत हो जाती है। 

नटखट को दंडित करने पर 
वह स्वयं दुखी तो होती है ,
कर्तव्य मान इसको अपना, 
वह वज्र हृदय पर रखती है। 

रखकर बालक को बंधन में 
वह सांस चैन की लेती है,
मन पर होता है बोझ
किन्तु काया विश्रांति पाती है।

कान्हा के नटखटपन से जब 
माता जसुमति थी दुखी हुई ,
कुछ समय पुत्र को बंधन में 
रख देने को वह विवश हुई। 

हम सब प्रकृति की संतति हैं, 
वह सुजला- सफला माता है ,
हमको अनुशासन में रखना 
इस माता को भी आता है। 

अपनी माता के अंगों को 
निज कर्मों से कुचला हमने ,
कुछ दंड हमें वह दे डाले ,
मजबूर किया उसको हमने। 

अब बंधन में हम को रख कर, 
देखो यह माँ सुस्ताती  है ,
ले स्वच्छ वायु में कुछ सांसे,
वह ताजा दम हो जाती है। 

नदिया के मैले आंचल को 
कुछ धोकर वह मुस्काती है,
माथे की सूरज -बिंदिया को 
वह थोड़ा सा उजलाती है। 

चंदा- तारों के गहने को  
घिस -घिस  कर फिर चमकाती है,
हरियाली उसके लहंगे की
झिलमिल झिलमिल लहराती है। 

सुनकर विहगों का मधुर राग
उसकी थकान मिट जाएगी,
पाकर एक नई स्फूर्ति तन में 
वह फिर हमको दुलराएगी। 

मोहन ने मां के बंधन को 
हंसते-हंसते स्वीकार किया, 
वह बंधन में क्या आ जाता? 
पूतना का जिसने नाश किया। 

बंधन में बंधे -बंधे उसने 
अश्विन कुमार को तार दिया ,
ओखली फंसा दो वृक्षों में ,
अर्जुन वृक्षों को उखाड़ दिया। 

मां के प्रदत्त इस बंधन को,
आओ हम भी हंसकर सह लें,
कोरोना की मारक क्षमता का 
हम भी समूल संहार करें। 

संभव है यह बंधन हमको 
वन में नवजीवन लाए,
कुछ अनुशासित हो जाएं हम, 
सृष्टि का भी संरक्षण हो, 
माता के स्नेहामृत को पा 
हम सबका उत्तम पोषण हो।। 

सरोजिनी पाण्डेय

अप्रैल अंक 

Friday, April 10, 2020

पलाश :- ममता त्रिपाठी

ग्रीष्म में दहकते वनों की
शोभा पलाश
चट्टानों में, वीरानों में
एकाकी हो खिलते पलाश
सूख चुकी आशाओं में
तुम जंगल की आग बन
फिरते पलाश
मृत-आशाओं की
जिजीविषा तुम
तुम्हीं नव-आस
जंगल के एकाकी पलाश।
तुम घोर रुदन में
मधुर हास
बुझती जिजीविषाओं के
जीवन-प्रकाश।
तुम निर्जन प्रकृति के
मुक्त हास।
तुम शुष्क भूमि के
जीवन-आधार।
तुम नैराश्य उदधि के
आशान्वित पतवार।
तुम उगते हो, तुम खिलते हो
एकाकी ही शत-शत बार।
शुष्क हो रहे वन-विटपों में
तुमसे ही वासंती बयार।

डॉ. ममता त्रिपाठी 

Monday, July 18, 2011

मानव और प्रकृति


प्रकृति-प्रज्ञा-शिशु मानव।
करता आविष्कार नवल-नव।
दुःसाहस तो इसका देखो,
छीन लिया धरती का कलरव॥
गहन तरु-लता नष्ट-भ्रष्टकर,
वसुधा विपिन-विहीन किया ।
कीट-पतंग औ सरीसृप संग,
खग-मृग-आश्रय छीन लिया॥
सिंह-शावकों का शैशव छीना,
मिलकर खूब शिकार किया।
जंगम-स्थावर प्रकृति का,
हो व्यसन-अन्ध संहार किया॥
लुप्त हो गयीं कई प्रजातियाँ,
कई पर संकट छाया है।
पारितन्त्र को तहस-नहस कर,
आखिर इसने क्या पाया है?