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Saturday, April 11, 2020

मूल : ममता त्रिपाठी

सरल नहीं है
मूल को भूलना। 
सरल है यह भ्रम पालना
भूल गये हैं मूल को
पर फुनगी पर चढ़कर भी
पुलई पर खिलकर भी
मूल से आना पड़ता है
मूल तक आना पड़ता है।
मूल पर झड़कर।
मूल ही बन जाना पड़ता है।
पर जीवन को
जीने के लिए
सुख को खोजने
और पालने के लिए
पालना पड़ता है भ्रम
मूल को भूलने का।
उसके अस्तित्वबोध को
नकारने का।
@ममता त्रिपाठी 

Friday, April 10, 2020

पलाश :- ममता त्रिपाठी

ग्रीष्म में दहकते वनों की
शोभा पलाश
चट्टानों में, वीरानों में
एकाकी हो खिलते पलाश
सूख चुकी आशाओं में
तुम जंगल की आग बन
फिरते पलाश
मृत-आशाओं की
जिजीविषा तुम
तुम्हीं नव-आस
जंगल के एकाकी पलाश।
तुम घोर रुदन में
मधुर हास
बुझती जिजीविषाओं के
जीवन-प्रकाश।
तुम निर्जन प्रकृति के
मुक्त हास।
तुम शुष्क भूमि के
जीवन-आधार।
तुम नैराश्य उदधि के
आशान्वित पतवार।
तुम उगते हो, तुम खिलते हो
एकाकी ही शत-शत बार।
शुष्क हो रहे वन-विटपों में
तुमसे ही वासंती बयार।

डॉ. ममता त्रिपाठी 

Saturday, July 20, 2013

करुण-चेतना................. ममता त्रिपाठी

शीत-शक्ति से सिक्त धरा की
सिहरन का आभास किसे है?
स्वयं बन्द हो पशमीना में
पर-पीड़ा-प्रति अवकाश किसे है?
कौन जानता उस चीरू को?
जिसका केश-वसन तन ढँकता ।
जब आभास नहीं है दिनकर
कब उगता है कब ढलता ।
चीरू के निश्छल नयनों का
कर्मठ तन्तुवाय हस्तों का,
भान किसे है, ज्ञान किसे है?
चन्देरी बुनते हाथों के
करघे पर चलते हाथों के,
परि मान-सम्मान किसे है?
कौन जानता है कितने
कष्टों में वो जीते होंगे ?
कौन जानता है कैसे वे
कलित कसीदा सीते होंगे ?
सौन्दर्य और कष्टों का ऐसा
विलक्षण-संयोग कहाँ होगा ?
चर्वणा करे इस रस का
किसने कष्ट सहा होगा?
वेदना का ज्ञान नहीं तो
संवेदना भला क्या होगी?
उपभोगों से बद्ध हृदय में,
करुण-चेतना क्या होगी ?
 
जुलाई अंक
ममता त्रिपाठी
नई दिल्ली

Sunday, May 5, 2013

स्मृतियाँ .... ममता त्रिपाठी



जब उनकी वो धूमल यादें,
खिड़की के झीने परदे से ।
झाँक-झाँककर मुझे देखती,
चिर-उत्सुक अपने नयनों से ॥
तब स्मृतियों का महासमुद्र,
लहर-लहर जग उठता है ।
उर्मि-उर्मि को चूम-चूमकर,
नया झरोखा खुलता है ॥
झीने से झिलमिल अंशुक से,
झीनी यादों का सूत्रपात ।
मधुऋतु की मोहक छवियों पर,
छुप-छुप होता दृष्टिपात ॥
मूक हृदय में छिपी भावना,
मोहकतामय मृदु विस्तार ।
स्मृति-झंकृत हृदय-सितार,
नयनों का मिलन हास-परिहास ।
विह्वल हो इस उदधि मध्य,
प्रतिपल विलसित-विकसित मधुर हास ।
विगत दिनों की करुण मधुरिमा,
वातायन-त्रसरेणु सजा इतिहास ॥ 

Tuesday, April 30, 2013

अप्रैल अंक: ममता त्रिपाठी की कविता : करें हम प्रत्यभिज्ञा


शक्तियाँ असीमित,
बस नेत्र हैं निमीलित,
निज पर विश्वास करें,
जीवन में सुवास भरें,
अन्तर्मन मुखरित हो,
क्लेश सब विगलित हो,
क्लान्ति-श्रान्ति त्यागें हम,
फिर एक बार जागें हम,
गहें पावन शिवाज्ञा
करें हम प्रत्यभिज्ञा।।
मुख न कभी म्लान हो,
शक्ति का संचार हो,
लक्ष्य का संधान हो,
जीवनोत्थान हो,
हो सफल प्रतिज्ञा।
करें हम प्रत्यभिज्ञा॥
गरिमा का घट भरे,
रोर पनघट करे,
बटेर फिर रट करे,
कि एक नया विहान हो,
नीला वितान हो,
हो शिव की अनुज्ञा।
करें हम प्रत्यभिज्ञा॥
गौरेया का कलरव,
गायों की नूपुर रव,
नव उल्लास दे,
वधुओं की रुन्झुन
घर को उजास दे,
जगे हमारी प्रज्ञा।
करें हम प्रत्यभिज्ञा

Friday, April 26, 2013

अप्रैल अंक: ममता त्रिपाठी की कविता : सम्हल जा रे दुष्ट दुःशासन !


कर तार-तार वसुधा का अञ्चल
जगज्जननी का तिरस्कार किया
शक्तिस्वरूपा साक्षात् शक्ति से
तज मानवता दुर्व्यवहार किया
धात्री धरती है जग को वह
मत भूलो जो उपकार किया
मन्त्रपूत पूजनीया महिला है
पूर्वज ऋषियों ने सत्कार किया
कम्पित धरा करुण क्रन्दन से
आन्दोलित मानस जननी का
सम्हल जा रे दुष्ट दुःशासन !
भोगेगा फल निजकरनी का
मूक अन्ध धृतराष्ट्र बना जो
वो कौरव नाश करायेगा
रुका नहीं अन्याय आज तो
काल रौद्ररूप धर आयेगा..........