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Saturday, December 7, 2013

क्या चारो ओर अंधेरा है ? निरज कुमार सिंह

मन में अंधेरा
तन में अंधेरा
प्यार में अंधेरा
तकरार में अंधेरा
विश्वास में अंधेरा
अंधविश्वास में अंधेरा
अंदर भी अंधेरा
बाहर भी अंधेरा
            क्या कोई उपाय नहीं है ? है
आओ पायें ज्ञान को
खोये हुए विश्वास को
समेटें उन बिखरते रिश्तों को
जिन्हें बनाये बरसों तक
फिर जी लें वो जिंदगी
अहा हँस कर, मुस्कुरा कर
पुरखों की यादों को सजाकर
बड़े-बूढों की पूजा कर
संस्कारों को अपनाकर
क्या अब भी अंधेरा है ?
नवंबर अंक
निरज कुमार सिंह
छपरा, बिहार

Sunday, August 11, 2013

बसंत............. निरज कुमार सिंह

लो आ गई बसंत, छायी बहार...
प्रकृति कर रही अपनी श्रृंगार,
लाल, हरे और पीले, नीले,
ऋतुओं ने हैं सब रंग बिखेरे।
मंद-मंद चलती बयार,
कल-कल करता ये नद-संसार।
पक्षियों की चहचहाहट में,
सिंह की गरजती दहाड़।
लो आ गई बसंत, छायी बहार...

पेड़ों पर कलियाँ लगीं हैं आने,
हरियाली का कंबल ताने,
आम्रमंजरी की सुगंध से,
भ्रमरों के दिल लगे हैं गाने।
कहीं कोयल की कू-कू है तो,
कहीं पपीहे की पीं-पीं,
ऐसा लगता है मानों,
धरती लगी है मुस्कुराने।
लो आ गई बसंत, छायी बहार...



अगस्त अंक
निरज कुमार सिंह
(छपरा, बिहार)