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Tuesday, April 30, 2013

मुकेश कुमार मिश्र: तुम न आई और मैं बाट जोहता रहा ....


               तुमने कहा था कि...............
रात के अंधकार मे मिलोगी तुम
मैंने भी सुना था कि
रात के अंधकार में मिलोगी तुम
दुर्भाग्य से उस दिन
जिस दिन का ये
वाकया है
पूनम की रात थी
अंधेरी रात तो
बहुत दूर की बात थी
फिर भी
पत्थर रख
अपने कलेजे पर
मैंने तुम्हारी यह
शर्त बिना शर्त
स्वीकार की
तब से न जाने
कितनी अंधेरी रातें
बितायी मैंने इन्तज़ार की
उसी दिन से मैं
अमावस की बाट जोहता रहा
बस तुमको ही खोजता रहा
न जाने तब से कितने अमावस आये
कितनी पूनम की रातें बीतीं
मैं पागलों सा
बस तुम्हारा ही
हाँ बस तुम्हारा ही
बाट जोहता रहा
पर आज हज़ारों पूनम
और हजारों अमावस
बीतने के बाद भी
तुम न आयी
और मैं ..............
पागलों सा बाट जोहता रहा
पर ये देखकर भी
तुम्हे दया न आयी
उस पूनम की रात से
जिसकी यादें मैं
आज तक सँजोता रहा
मुझे न पड़ी दिखाई कभी
तुम्हारी परछाईं
क्योंकि तुम निष्ठुर !
वचन देकर
कभी लौटकर न आयी
और मैं..................
और मैं................
पागलों सा
तुम्हारी प्रतीक्षा करता रहा
दिनों को गिनता रहा
पर कभी वो अंधेरी रात न आई
जिसमें तुम मिलती
अन्ततः तुम न आई
और मैं.........................
बाट जोहता रहा

Friday, April 19, 2013

अप्रैल अंक: मुकेश कुमार मिश्र की रचना - प्रथम नमन


वन्दन है
अभिनन्दन है
अर्चन है,
उस दिव्य दिया का,
जलता रहता शाम-सुबह जो,
मेरे अंधकार पथ पर,
वन्दन है
अभिनन्दन है
अर्चन है,
उस महासलिल का,
जो मेरे जीवन खेतों ,
को नित-नित सींचा करता है,
वन्दन है
अभिनन्दन है
अर्चन है,
उस महावायु का,
बहता रहता क्षुद्र हृदय में,
जो अविरल प्राणरूप में,
वन्दन है
अभिनन्दन है
अर्चन है,
उस वसुधानी का,
जो अपने उर
पर हम सबको,
सदा धरा करती है,
वन्दन है
अभिनन्दन है
अर्चन है,
उस महागगन का,
जो अपने मानस-विशाल का
परिचय देता जनमानस को,
बार-सहस्त्र वन्दन है
लक्ष-बार अभिनन्दन है
कोटिशः अर्चन है,
उस जीवनदायिनी माँ का,
उस प्राणवाहिनी माँ का,
उस प्रेमसिंचिका माँ का.......
जो मेरे भौतिक शरीर में,
रक्त-रूप बहा करती है,
तमस्-विहीन मार्ग हेतु
जो नित तिल-तिल जला करती है,
जो अपने असीम प्रेमजल से,
मुझको सींचा करती है....................

Wednesday, March 7, 2012

होली...


रंग-बिरंगे इन्द्रधनुष को लेकर आयी होली है ।
कहीं उड़ रहा अबीर गुलाल कहीं सज रही रोली है ।
निकल पड़ी लेकर पिचकारी अब बच्चों की टोली है ।
नगर, गाँव औ हर नुक्कड़ पर हँसी और ठिठोली है ॥
फागुन की यह देन मनोहर कण्ठ-कण्ठ में फाग सजा है ।
हृदय-हृदय उत्सुक आनन्दित अब ऐसा ऋतुराज सजा है ।
कोपल-कोपल में नव उमंग, मकरन्द औ पराग सजा है ।
महक रही है क्यारी-क्यारी कानन में अनुराग सजा है ।।

Sunday, July 24, 2011

कवि-सृष्टि


कवि की यह सृष्टि अलौकिक
यहाँ शशकशृंग भी होता है ।
चकवी के वियोग में चकवा
सदा यहाँ पर रोता है ॥
दूर कहीं गगनाञ्चल में,
आकाशकुसुम भी यही खिलाते,
जब भी कोई बच्चा रोता,
चन्दामामा पास बुलाते।
देखो कवि-कल्पना अलौकिक,
कृत्रिम होकर भी है मौलिक।
ये आग से सिंचन करते,
आकाशमार्ग से प्रवचन करते।
नहीं यहाँ कुछ भी असम्भव,
दरिद्र नारायण, कुबेर का वैभव ॥
काव्यलोक कल्पना से इनकी,
निशिदिन सज्जित होता है ।
निर्धन की कुटिया में भी,
प्रासाद अलंकृत होता है ॥
यहाँ पर कोयल सदा कूजती,
आकाश निहारता चातक है ।
करुणा में भी आनन्द यहाँ,
करुण-रस आह्लादक है ॥

Sunday, March 20, 2011

कहाँ गयी वह प्यारी फुदकन?

आँगन में गौरैया की फुदकन,
उसका मनभावन चञ्चलपन,
छप्पर से तिनको की कतरन,
किरणों का आना वह छन-छन।
कहाँ गयी वह प्यारी फुदकन?
फुद-फुदककर फुर उड़ जाती,
जब भी गरमी उसे सताती,
चूँ-चूँ करके पानी पीती,
वह पल लगता मनभावन।
कहाँ गयी वह प्यारी फुदकन?
जब भी हम उसे सताते,
उसे पकड़ने चुपके जाते,
उड़कर पत्तों में छुप जाती,
रह जाता राह देखता बालमन।
कहाँ गयी वह प्यारी फुदकन?
रोज सुबह हम जब उठते,
दाना छींटकर उसे बुलाते,
पर तब तक वह पास न आती,
जबतक पाती न माँ का आश्वासन।
कहाँ गयी वह प्यारी फुदकन?
दाना चुगकर फुर उड़ जाती,
फिर शिशु को खाना सिखलाती,
चोंच में उसका दाना खिलाना,
लगता था हमें बहुत लुभावन।
कहाँ गयी वह प्यारी फुदकन?
उसके विना वीरान आँगन,
कचोटता है यह सूनापन,
सुबह आँख खोलते ही अब,
नहीं सुनाई पड़ती वह चँहकन, ।
कहाँ गयी वह प्यारी फुदकन?
उसके विना हर सुबह वीरान है,
शोरगुलों के बीच छायी नीरवता,
स्तब्धता और एक खालीपन,
उसकी चूँ-चूँ सुनने तड़प रहा मन,
कहाँ गयी वह प्यारी फुदकन?
वह प्यारी गौरेया, प्यारी फुदकन,
उसकी चँहक से संगीतमय हर मन,
आओ बचायें उसका जीवन,
देकर उसे दाना-पानी और संरक्षण,
ताकि खो न जाये उसका जीवन,
बचायें हम आँगन की प्यारी फुदकन॥