कालप्रियानाथ का कण्ठ नहीं साथ है।
दधीचि-अस्थि का वज्र नहीं पास है।
जो इस कालकूट विष का पान कर सके।
इन राक्षसी प्रवृत्तियों का संहार कर सके।
मानवता के अश्रु की धार बह रही।
दानवता अट्टहास कर संहार कर रही॥
त्रयम्बक का तीसरा नेत्र कब खुलेगा?
शुचिता का सूर्य कब क्षितिज पर उगेगा?
प्रतीक्षा की घड़ियाँ समाप्त कब होंगी?
मनुजता को पशुता से मुक्ति कब मिलेगी?
ये दानवी नरपिशाच मनुष्य कब बनेंगे?
पद्मसर में पावनपूज्यपुष्प कब खिलेंगे?
भगवन्! ये धुंध, ये कुहासा कब मिटेगा?
भ्रष्टाचार का गहन बादल कब छँटेगा?