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Thursday, May 7, 2020

एक गृहिणी की आत्मस्वीकृति: सरोजिनी पाण्डेय


आजकल मैं घर में झाड़ू लगाती हूं,
 घर में ही रहकर लॉक डाउन मनाती हूं ।
 
सुबह की चाय पीकर बुहारी उठाती हूं,
  सफाई के अभियान में कमर-कस जुट जाती हूं,
 इस दौरान मैं कभी झुकी ,कभी उकड़ूँ ,
 और कभी -कभी ऊंची खड़ी भी हो जाती हूं।
 पोछा लगाना होता है थोड़ा कठिन ,
 इसके लिए पहले थोड़ी हिम्मत जुटाती हूं, कभी पैरों पर बैठ ,कभी घुटनों को टेक और कभी हाथों को फर्श पर टिकाती हूं ,
  राम और हनुमान की जय -जयकार करते हुए इस परीक्षा में  पास भी हो जाती हूं ,।
  
आजकल मैं घर में झाड़ू लगाती हूं ।
 
हाथ -पैर चलते हैं ,मन भी थिर नहीं रहता, सोचती हूं, इसमें कितने आसन कर जाती हूँ,!! पर्वतासन ,ताड़ासन, कुक्कुटासन में सफाई कर थक कर जब लेटूँ तो शवासन में चली जाती हूं ,।

आजकल मैं घर में झाड़ू लगाती हूँ।

इधर -उधर कहीं कुछ गंदा अगर छूट जाए ,
उस तरफ से चुपके से आंखें हटा लेती हूं ,
मन में चुभन होती है ,लज्जा -सी आती है, **सेविका*के साथ भी क्या ऐसा कर पाती हूँ??
करती हूँ विश्राम जिनके श्रम के बल पर ,
क्या उनके श्रम का मूल्य मैं दे पाती हूँ???
समझ में अब आता है *श्रम तो अमूल्य है ***
उसको पैसों से क्यों तौलना मैं चाहती हूं!!! 
अपने सहायकों,अपने शुभचिंतकों के प्रति,
कृतज्ञता के भाव से शीश मैं झुकाती हूँ!!!

आजकल घर में मैं झाड़ू लगाती हूँ !!
घर में ही रहकर लॉक डाउन मनाती हूँ!!



सरोजिनी पाण्डेय 
मई अंक 

Friday, April 10, 2020

जीवन प्रवाह : ममता त्रिपाठी

जीवन है
एक प्रवाह
सूक्ष्म से स्थूल
स्थूल से सूक्ष्म
एक चक्र है
लघु से गुरु
गुरु से लघु
समस्या तभी
आती है
जब हम
अपने गुरुत्व में
लघु को
भूल जाते हैं
स्थूल के महाकाया में
खोकर
सूक्ष्म को
अनदेखा करते हैं।
जब कर्म को
केवल
कर्मेन्द्रियों तक
समेटते हैं
और
ज्ञानेन्द्रियों की
विषयों के प्रति
गति को
समझना नहीं चाहते।
जब केवल
साक्षी के साक्ष्य पर ही
अपराधों को
अपराध समझते हैं 
प्रज्ञापराध पर
लम्बी चुप्पी
गहन मौन
साध लेते हैं।
अब बताइये कि
भला कौन
दहन होगा
उस आग में
जिसे अंतस् में
पालकर हम
प्रशांत दिखते हुये
सभ्य बने हुये हैं।
एक दिन
उठेगी ही
वह ज्वाला
जिसकी आज हम
आग लिये बैठे हैं।
#ममतात्रिपाठी

Monday, December 27, 2010

वन्दनीय


वन्दनीय वह निष्कम्प दीप है,
जो झंझावातों में जलता।
वन्दनीय शाश्वत प्रदीप है,
जो जगती का तम हरता।
वन्दनीय वह सागर-सीप है
गर्भ में जिसके मोती पलता।
अभिनन्दनीय वह मानस भी है
जो इन्हें स्नेह से सींचा करता।।