Wednesday, March 7, 2012

होली...


रंग-बिरंगे इन्द्रधनुष को लेकर आयी होली है ।
कहीं उड़ रहा अबीर गुलाल कहीं सज रही रोली है ।
निकल पड़ी लेकर पिचकारी अब बच्चों की टोली है ।
नगर, गाँव औ हर नुक्कड़ पर हँसी और ठिठोली है ॥
फागुन की यह देन मनोहर कण्ठ-कण्ठ में फाग सजा है ।
हृदय-हृदय उत्सुक आनन्दित अब ऐसा ऋतुराज सजा है ।
कोपल-कोपल में नव उमंग, मकरन्द औ पराग सजा है ।
महक रही है क्यारी-क्यारी कानन में अनुराग सजा है ।।

Sunday, July 24, 2011

कवि-सृष्टि


कवि की यह सृष्टि अलौकिक
यहाँ शशकशृंग भी होता है ।
चकवी के वियोग में चकवा
सदा यहाँ पर रोता है ॥
दूर कहीं गगनाञ्चल में,
आकाशकुसुम भी यही खिलाते,
जब भी कोई बच्चा रोता,
चन्दामामा पास बुलाते।
देखो कवि-कल्पना अलौकिक,
कृत्रिम होकर भी है मौलिक।
ये आग से सिंचन करते,
आकाशमार्ग से प्रवचन करते।
नहीं यहाँ कुछ भी असम्भव,
दरिद्र नारायण, कुबेर का वैभव ॥
काव्यलोक कल्पना से इनकी,
निशिदिन सज्जित होता है ।
निर्धन की कुटिया में भी,
प्रासाद अलंकृत होता है ॥
यहाँ पर कोयल सदा कूजती,
आकाश निहारता चातक है ।
करुणा में भी आनन्द यहाँ,
करुण-रस आह्लादक है ॥

Monday, July 18, 2011

मानव और प्रकृति


प्रकृति-प्रज्ञा-शिशु मानव।
करता आविष्कार नवल-नव।
दुःसाहस तो इसका देखो,
छीन लिया धरती का कलरव॥
गहन तरु-लता नष्ट-भ्रष्टकर,
वसुधा विपिन-विहीन किया ।
कीट-पतंग औ सरीसृप संग,
खग-मृग-आश्रय छीन लिया॥
सिंह-शावकों का शैशव छीना,
मिलकर खूब शिकार किया।
जंगम-स्थावर प्रकृति का,
हो व्यसन-अन्ध संहार किया॥
लुप्त हो गयीं कई प्रजातियाँ,
कई पर संकट छाया है।
पारितन्त्र को तहस-नहस कर,
आखिर इसने क्या पाया है?

Monday, June 27, 2011

माटी की गन्ध से अम्बर महक उठा

भीनी फुहारें औ सुगन्धि सोंधी छायी है।
बहु प्रतीक्षोपरान्त वर्षाऋतु आयी है।
मयूरवृंद संग मन-मयूर नाच उठा।
माटी की गन्ध से अम्बर महक उठा॥
घुमड़-घुमड घने घन से घिरा गगन।
लगा अभी प्रात है नहीं हुआ मध्याह्न।
भीगने  एक क्षण मन मचल उठा।
माटी की गन्ध से अम्बर महक उठा॥
बहु कर्णप्रिय लगे अम्बर का अनुरणन।
झींगुरों की झंकार औ भ्रमरों का गुञ्जन।
स्वाती की आस में चातक चँहक उठा।
माटी की गन्ध से अम्बर महक उठा॥
चमक उठी बिजली नभ में ज्यों कञ्चन।
आषाढ़ ने भुला दिया जेठ की कटु-तपन।
तरु-तरु, पर्ण-पर्ण मानो पुलक उठा।
माटी की गन्ध से अम्बर महक उठा॥