Monday, June 27, 2011

माटी की गन्ध से अम्बर महक उठा

भीनी फुहारें औ सुगन्धि सोंधी छायी है।
बहु प्रतीक्षोपरान्त वर्षाऋतु आयी है।
मयूरवृंद संग मन-मयूर नाच उठा।
माटी की गन्ध से अम्बर महक उठा॥
घुमड़-घुमड घने घन से घिरा गगन।
लगा अभी प्रात है नहीं हुआ मध्याह्न।
भीगने  एक क्षण मन मचल उठा।
माटी की गन्ध से अम्बर महक उठा॥
बहु कर्णप्रिय लगे अम्बर का अनुरणन।
झींगुरों की झंकार औ भ्रमरों का गुञ्जन।
स्वाती की आस में चातक चँहक उठा।
माटी की गन्ध से अम्बर महक उठा॥
चमक उठी बिजली नभ में ज्यों कञ्चन।
आषाढ़ ने भुला दिया जेठ की कटु-तपन।
तरु-तरु, पर्ण-पर्ण मानो पुलक उठा।
माटी की गन्ध से अम्बर महक उठा॥

11 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

वर्षा एइतु में होने वाले प्राकृतिक परिवर्तन का सटीक चित्रण

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

हिंदी के महकते हुए शब्द अब कम ही नजर आते हैं.ऋतु-वर्णन में आपका शब्द-चयन प्रशंसनीय है.

Kailash C Sharma said...

वर्षा ऋतु का बहुत सुन्दर शब्द चित्र उकेरा है..भावों और शब्दों का सुन्दर संयोजन..

: केवल राम : said...

वर्षा ऋतू का सजीव अंकन करती आपकी यह रचना मन भावन है ....!

Amrita Tanmay said...

बेहद भावपूर्ण, अद्भुत चित्रण ,बधाई

shikha varshney said...

खूबसूरत हिंदी के शब्दों के खूबसूरत प्रयोग से ऋतु वर्णन बेहतरीन.

Dilbag Virk said...

आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें
चर्चा मंच

निवेदिता said...

वर्षा ॠतु एकदम सजीव हो उठी ....... प्रशंसनीय !

Dr. shyam gupta said...

सुन्दर वर्षा वर्णन .....

sunil said...

very good keep it up
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sunil said...
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