Thursday, January 18, 2018

वो... रेनू वर्मा

वो मेरे घर की गलियां
वो मेरे बाग़ की ठंडी हवा
वो मेरे छत की तारों वाली झिलमिल रातें 
वो मेरे शहर की सडकों पर चलती गाड़ियों का शोर
वो दोस्तों के साथ घूमना
वो माँ के डर से घर जल्दी जाने की ज़िद करना
वो पापा की डांट से बचने के लिए किताब लेके बैठना
वो भाई बहनों के साथ झगड़ना 
वो वक़्त बीत गया
वो समां गुज़र गया 
हम भी आगे बढ़ गए
और ज़माना भी आगे बढ़ गया
अब बस यादें रह गयी हैं
जो भुलाई नहीं जाती हैं। 

5 comments:

Sanjeev Teotia said...

Nicely
written

Unknown said...

Simply awesome....!!!!

Kamal Kishor said...

Nice lines........

Shyam sunder said...

Lines that touches everyone's life.....well written....

rarebooks said...

Thank you all