Sunday, November 12, 2017

sheetal godiyal


Bndise aam h , mohabbt nakam h.
Wafaye kaash h, umeede rakh h.
Lamha-e-arju h, sikayte saj h.
Jhut jo sch h, sch ek raj h.
Hukumt-e-ishq h, talim-e-taaj h.
Junuy-e-aashiqui h, hsrte gulab h.

Bndise aam h, mohbbt nakam h

Saturday, February 22, 2014

वही है मेरा हिन्दुस्तां..........राहुल व्यास


जहाँ हर चीज है प्यारी
सभी चाहत के पुजारी
प्यारी जिसकी ज़बां

वही है मेरा हिन्दुस्तां
जहाँ ग़ालिब की ग़ज़ल है

वो प्यारा ताज महल है
प्यार का एक निशां
वही है मेरा हिन्दुस्तां
जहाँ फूलों का बिस्तर है
जहाँ अम्बर की चादर है
नजर तक फैला सागर है
सुहाना हर इक मंजर है
वो झरने और हवाएँ,
सभी मिल जुल कर गायें
प्यार का गीत जहां
वही है मेरा हिन्दुस्तां
जहां सूरज की थाली है

जहां चंदा की प्याली है
फिजा भी क्या दिलवाली है
कभी होली तो दिवाली है
वो बिंदिया चुनरी पायल
वो साडी मेहंदी काजल
रंगीला है समां
वही है मेरा हिन्दुस्तां
कही पे नदियाँ बलखाएं

कहीं पे पंछी इतरायें
बसंती झूले लहराएं
जहां अन्गिन्त हैं भाषाएं
सुबह जैसे ही चमकी
बजी मंदिर में घंटी
और मस्जिद में अजां
वही है मेरा हिन्दुस्तां
कहीं गलियों में भंगड़ा है

कही ठेले में रगडा है
हजारों किस्में आमों की
ये चौसा तो वो लंगडा है
लो फिर स्वतंत्र दिवस आया
तिरंगा सबने लहराया
लेकर फिरे यहाँ-वहां
वहीँ है मेरा हिन्दुस्तां
जनवरी अंक


राहुल व्यास

मैँ पण्यसुंदरी.............कहफ़ रहमानी


             
मैँ  पण्यसुंदरी!

नर  के  उद्विग्न  मन  की।
यह सुश्रोणि , समुन्नत उरोज , मधुमत्त कटि
.
विभासित  उन  स्पर्शोँ  से
प्रमत्त भुजदंडोँ  से।
.
मैँ   एक   वस्तु ,
यौनिकान्न!
तप्त-तप्त   रुधिर   का।
.
अवगुंठित   योषिताभिव्यक्ति
मुखरित  सर्वत्र   यह   लोकोक्ति
.
"कर  अर्पित  यौवनोपहार
क्षम्य  नहीँ  कौमार्य"|
दिसंबर अंक

                   कहफ़   रहमानी


             मुज़फ़्फ़रपुर(बिहार)

प्रणव शुक्ला

तेरी हर सजा क्या नाकाफी थी जो अब ठुकरा दिया मुझको,
मैं तो आशिक  था तेरा   -   दीवाना  बना दिया मुझको,
कभी कर न सका  इज़हार-ऐ-मुहब्बत यही खता थी मेरी,
इतनी सी बात पर तूने ये क्या बना दिया मुझको। 

वो लोग खुश हैं अब बहुत जो ना चाहते थे हमको,
की  अब नहीं लगाते हम - दिल से किसी को,
कुछ बात थी तुझमे - कि  दिल लगाया था
वो भी तोड़ कर तूने मिटा दिया मुझको। 

दिसंबर अंक
प्रणव शुक्ला

Monday, December 9, 2013

चाहत..................रजनीश कुमार पाण्डेय


चाहतों की चाहतें, चाहत ही बनकर रह गयी।
उनको पाने की तमन्ना ख्वाहिशें ही रह गयी॥

कुछ तो उनमें बात थी जो, दिल तड़प कर रह गया।
उनकी अदाएँ देखकर, दिल मचल के रह गया॥
भावनाओं में थी मासूमियत की कुछ ऐसी लहर।
अ़क्लमन्दी की सारी क़यासें उनमें बहकर रह गयी॥

परम्पराओं में कुछ इस तरह जकड़ा हुआ था मेरा मन।
इश्क़ पाने की तमन्ना उनमें जकड़कर ही रह गयी॥
ग़ौर करता हूँ कभी मै, मासूमियत उनके चेहरे की।
पर मासूम तो था दिल भी मेरा, मासूम बनकर रह गया॥

इश्क़बाज़ी की भला इससे बड़ी इन्तहाँ क्या और होगी।
हम चाहते रहें इतना उनको, पर वो इनकारते ही रह गये॥
ज़िन्दगी के सफ़र में इससे बड़ा सदमा था न कोई।
चाहते थे जिनको दिल से, उनके मन में नफ़रतें ही रह गयीं॥

ख़्वाबों में मेरे आये कुछ इस तरह वो ख़्वाब बनकर।
फिर से उनको पाने की तमन्ना दिल में मचल गयी॥
हैरान हूँ मैं अपने दिल के नफ़रतों के अन्दाज़ से।
नफ़रतों से नफ़रत करके वो प्यार में ही बह गया॥

चाहतों की भला इससे बड़ी सज़ा क्या और होगी।
चाहतों की चाहतें चाहत ही बनकर रह गयीं॥

रजनीश कुमार पाण्डेय
नयी दिल्ली
नवंबर अंक

Saturday, December 7, 2013

आलोकवर्द्धन.........कहफ़ 'रहमानी'


      हूँ  विशिष्टतम !
      गुण  निज  आकुंचन,

      सतत  परिवर्तित  एकाग्र-चिँतन ।



      प्रार्थी  प्रेम  की
      वृक्ष  मनोहारी, आकर्षी
      रुप-विजन छाँह  सघन ।



     बैठ  तू  इस  ठाँव
     आ  क्षणिक  विश्राम  कर
     कि  मैँ  उर-स्वन, शीतल-भुवन ।



     दे  झकझोर
     कुसुमित  पल्लवित  यह  देह
     मिटा  ताप
     सुन  सुगम  संकीर्तन ।



     तू  पाताल, मैँ  आकाश
     तू क्षर-अक्षर, मैँ  दिशाकाश
     रच  कविता, गाय  मन  उन्मन ।



     भू  से  आकाश  तक  मिलती  रहूँ
     रहे  न  पंथ  अपरिचित,गान  उन्मन
     तन  एकल, तान  उन्मन ।



     मेरे  ही  स्वर  साकार
     सिँचित  विश्व-उपवन
     मैँ  प्रेमोद्वेल्लित  विशुद्ध- मन ।



     तू  नील-कुसुम, मैँ  मग
     तू  सुमोँ  का  सुम, मैँ  खग

     मिल  एक  बन; हो  'आलोकवर्द्धन'
नवंबर अंक
कहफ़  'रहमानी'


मुज़फ़्फ़रपुर,बिहार

क्या चारो ओर अंधेरा है ? निरज कुमार सिंह

मन में अंधेरा
तन में अंधेरा
प्यार में अंधेरा
तकरार में अंधेरा
विश्वास में अंधेरा
अंधविश्वास में अंधेरा
अंदर भी अंधेरा
बाहर भी अंधेरा
            क्या कोई उपाय नहीं है ? है
आओ पायें ज्ञान को
खोये हुए विश्वास को
समेटें उन बिखरते रिश्तों को
जिन्हें बनाये बरसों तक
फिर जी लें वो जिंदगी
अहा हँस कर, मुस्कुरा कर
पुरखों की यादों को सजाकर
बड़े-बूढों की पूजा कर
संस्कारों को अपनाकर
क्या अब भी अंधेरा है ?
नवंबर अंक
निरज कुमार सिंह
छपरा, बिहार