Friday, December 29, 2017

नयी शुरुआत.. रेनू वर्मा

सर्द लहरें भयानक तूफान,
जीने की जदोजहद, डूबते अरमान 

कुछ अनकहे शब्द, कुछ अनसुलझे सवाल 
खुद को खोने का गम, सब कुछ ख़तम होने का एहसास 

सब जाना पहचाना, सब अनजान सा लगता है 
क्यों लगता है बहुत कुछ बीत गया, अब थम जाना चाहिए 

वक़्त भी रुक गया है और मैं भी रुक गयी हूँ 
ये अंत है या कोई नयी शुरुआत.

Monday, December 11, 2017

नया युग रचो मानव : सुशील कुमार वर्मा

क्या है ये खेल नसीब का, 
जिन्दगी कैसे गुजरेगी गरीब का,
चढ़ते हैं जहाँ छप्पन भोग मन्दिर में, 
वहीं चौखट पर गरीब भूख से मर रहा!! 

कैसा है खेल किस्मत का,
जिन्दगी कैसे बीतेगी धनहीन का, 
चढ़ते हैं जहाँ चादर मजार में, 
वहीं मजार पर ठण्ड से वस्त्रहीन मर रहा!!

कैसा है स्वभाव इंसान का, 
मानवता का अपमान किया, 
सांपों ने भी छोड़ दिया डसना, 
जब से इंसान एक दूसरे को डस रहा!! 

कैसा है स्वरुप मानव का, 
श्रेष्ठ बुद्धिजीवी होने का गौरव ह्रास किया,
गिरगिट भी भूल गया रंग बदलना,
इंसान जब से रंग बदलना शुरु किया!! 

कब तक चलती रहेगी ऐसी युग, 
जन मानव ही मानव का साथ नहीं दे रहा, 
बदल क्यों नहीं दे रहा बुरी स्वभाव हे मानव
एक नया युग क्यों नहीं रच रहा!!
         
       सुशील कुमार वर्मा 
      गोरखपुर विश्वविद्यालय गोरखपुर
         सिन्दुरियां महराजगंज

Thursday, November 30, 2017

ग़ज़ल : तारिक़ अज़ीम 'तनहा'

बड़ा मुश्किल हैं दिल की हर बात कहना,
जैसा रात को दिन, दिन को रात कहना!

हर जख्म दिल का उसका ही नाम लेता हैं,
कहीं वो मिले तो मुझसे मुलाकात कहना!

सच्चाई कड़वी होती हैं, रिश्ते तोड़ देती हैं,
सच जब भी कहना नरमी के साथ कहना।

पूरा दिन लेक्चर करके टूट जाना और फिर,
रात को कलम से कागज़ पर जज़बात कहना!

रोता है 'तनहा' ग़म-ए-जुदाई में इस कदर,
होती हैं आँखों से खून की बरसात कहना।


तारिक़ अज़ीम 'तनहा'

Tuesday, November 21, 2017

माँ पद्मावती-बलिदान की सजीव मूर्ति: अभिषेक पाराशर

तिमिरा रजनी भी जिस माता के शौर्य गीत को गाती है,
जिस वसुधा पर उत्सर्ग किया वह पुण्यभूमि कहलाती है,
गाथा सुनकर उस माता की,मृत उर में रोमाञ्च कूँद जाता है,
चन्द रुपये के यश,लालच में मानव मन इतिहास मोड़ जाता है।।1॥
जिनके त्याग वेग के कारण नभ भी नतमस्तक होता था,
जिनकी नीति के घर्षण से पिशाच खिलजी भी रोया था,
स्पर्श न कर पाया पावन काया को,सुनकर अश्रु टपक जाता है,
चन्द रुपये के यश,लालच में मानव मन इतिहास मोड़ जाता है।।2॥
सहस्त्र अश्व टापों की ध्वनि उस माँ को व्याकुल न कर पाई,
उस कुत्ते खिलजी के सेना मन को चंचल न कर पाई,
समकालीन राजाओं की कायरता से, यह हृदय पिघल जाता है,
चन्द रुपये के यश,लालच में मानव मन इतिहास मोड़ जाता है।।3॥
वीरवती ने अन्तिम क्षण तक, भारत का भगवा लहराया था,
नमन करूँ ‘हे भारत की संस्कृति’, इन्द्र भी पुष्प बरसाया था,
उस माँ के भावों को समझकर, रोम-रोम भड़क जाता है,
चन्द रुपये के यश,लालच में मानव मन इतिहास मोड़ जाता है।।4॥
लंका हो या चित्तौड़ की भूमि, शान बढ़ाती भारत की नारी,
पश्चिम को देती है निदर्शन, सतीत्व से सूर्यास्त कराती नारी,
उन माताओं के तप को स्मरण कर, ‘अभिषेक’ किया जाता है,
चन्द रुपये के यश,लालच में मानव मन इतिहास मोड़ जाता है।।5॥
उपरोक्त कविता का अवतरण मात्र इस प्रार्थना के साथ कि सामयिक रूप से चल रही घटना के सम्बन्ध में,कोई भी अपनी माताओं को जिनका नाम भारतीय इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है, नृत्य करते हुए नहीं देखेगा। अतः इसे पूर्णत: नकार देवें।
धन्यवाद।

अभिषेक पाराशर 
Abhishek Parashar
System Admin O/o Sr Supdt. Of Postoffices

  • Mathura Division, Mathura-281001

Saturday, November 18, 2017

मैं शिक्षक, मैं हूँ....': प्रशांत अग्रवाल

कच्ची मिट्टी जैसा बचपन
भावी भारत का जन-गण-मन
मैं ही इसको गढ़ने वाला
स्वर्णिम सपनों का रखवाला
मुझसे हो सुन्दर निर्माण
मैं शिक्षक, मैं हूँ कुम्हार।
शाला उपवन, बच्चे बीज
भली-भाँति मैं इनको सींच
विस्तृत वृक्ष बनाऊंगा
सुरभित सुमन खिलाऊंगा
चहुँदिशि होगी हरियाली
मैं शिक्षक, मैं हूँ माली।
बच्चे मानो रुई-कपास
कुशल हाथ की इन्हें तलाश
मैं कातूँगा सुन्दर सूत
ताना-बाना भी मजबूत
होंगे उपयोगी घर-घर
मैं शिक्षक, मैं हूँ बुनकर।
बच्चे कोमल तन-मन वाले
कीच में सनकर हँसने वाले
तन-मन स्वच्छ बनाऊंगा
स्वयं स्वच्छ हो जाऊंगा
सबका होगा परिष्कार
मैं शिक्षक, मैं स्वच्छकार।


प्रशांत अग्रवाल
सहायक अध्यापक
प्राथमिक विद्यालय डहिया
विकास क्षेत्र फतेहगंज पश्चिमी
जिला बरेली (उ.प्र.)

अर्धनारीश्वर : लवनीत मिश्र

नर नारी का भेद केवल,
रूप रंग का भेद नहीं,
नर नारी की समानता,
आदर है,कोई खेद नहीं,
हर नर मे निहित है,
नारी सामान संवेदना,
हर नारी मे निहित है,
पुरषारत की चेतना,
अर्धनारीश्वर रूप है,
उदाहरण इस रूप का ,
सम्मान हो एक दूजे का,
आदर हो इस स्वरुप का,
अहंकार के जाल मे,
उलझा यह समाज है,
पौरुष और नारित्वा का,
भेद ही विनाश है,
सृष्टि के  चक्र  का,
यह दो आधार है,
साथ हो तो मंज़िले,
पृथक तो बेकार है,

Loveneet Mishra

Friday, November 17, 2017

मेरी माटी : नीलू मलिक

सबसे सक्षम मेरी माटी 
सुगंध इसकी भीनी-भीनी 
वसंत, ग्रीष्म, वर्षा
हेमंत, शिशिर, शरदऋतु 
छः ऋतुओं की यह है रानी 
आंचल में इसके कश्मीर की घाटी 
श्वेत हिमालय बना श्रृंगार 
नित पहिनाता इस माटी को 
अमूल्य हिम् तुषार हार 
नाना धान्यों से गोद भरी है 
श्रेष्ठ- मौसमी फलों की झरी है 
लहराते सागर इस पर 
बहती नदियाँ कल- कल निर्झर
बने अमूल्य जल- निधि भण्डार 
यह पारस यह हीरा 
यह सोना ये मोती 
खनिज धातु अमूल्य 
इस माटी के अंश हैं सभी 
कई रहस्य गुप्त हैं अभी 
कहने को मटमैला है रंग 
हज़ारो रंग इसीसे उभरे 
असंख्य फसलें हैं निखरे 
मिट्टी का भी क्या स्वाद है 
हर स्वाद की यही बुनियाद है 
फूल- फूल में इसकी खुशबू 
कण्ड- कण्ड में है इसका जादू 
हर प्राणी में तत्व इसीका 
जन्मदात्री सबकी यही है माता 
यही है अंतिम आश्रय- दाता 
यह चाहे तो केहर मचादे
करदे ज़न्नत, हर वीराँ घाटी 
सबसे सक्षम मेरी माटी