Friday, September 6, 2013

बुलन्द आवाज.................हरिहर झा

चिढ़ाने का सा भाव
सपनीली आँखों से
देख कर
मैं अपने को पाता हूँ
आधा अधूरा
यह खालीपन …
जाने क्यों ?
ढूढंता हूँ
कुछ पाने के लिये
पर हाथ बढ़ा कर भी
रोक नहीं पाता
फिसलते क्षण;
विरान दिल को
डूबा देती हो अथाह सागर में
तुम्हारे धनुष-बाण घुस आते हैं -
दिल-दिमाग की तंत्रियां झंझोड़ कर
नग्न विचारों को एक झटका देकर
अनकहे भावों की बखिया उधेड़ कर
दे देती हो
एक तिनके का सहारा
जिसका आशय समझ नहीं पाता
मौन वार्ता सुन नहीं पाता
कुछ जान नहीं पाता
सिवा इसके कि -
आकाश से दुधिया चांदनी
जब रिसती हुई गीरती है
धरती के दामन पर
तो यह मदमस्ती बरगलाती
प्रलोभन देती
इसकी लहलहाती फसल
थामे हुये जो तुम खड़ी हो
यह तुम्हारे जिस्म से निकलती
बुलन्द आवाज है
रूह से निकलता
संगीत है।

सितम्बर अंक
हरिहर झा
Melbourne
Australia

Sunday, August 11, 2013

बसंत............. निरज कुमार सिंह

लो आ गई बसंत, छायी बहार...
प्रकृति कर रही अपनी श्रृंगार,
लाल, हरे और पीले, नीले,
ऋतुओं ने हैं सब रंग बिखेरे।
मंद-मंद चलती बयार,
कल-कल करता ये नद-संसार।
पक्षियों की चहचहाहट में,
सिंह की गरजती दहाड़।
लो आ गई बसंत, छायी बहार...

पेड़ों पर कलियाँ लगीं हैं आने,
हरियाली का कंबल ताने,
आम्रमंजरी की सुगंध से,
भ्रमरों के दिल लगे हैं गाने।
कहीं कोयल की कू-कू है तो,
कहीं पपीहे की पीं-पीं,
ऐसा लगता है मानों,
धरती लगी है मुस्कुराने।
लो आ गई बसंत, छायी बहार...



अगस्त अंक
निरज कुमार सिंह
(छपरा, बिहार)



Saturday, July 20, 2013

करुण-चेतना................. ममता त्रिपाठी

शीत-शक्ति से सिक्त धरा की
सिहरन का आभास किसे है?
स्वयं बन्द हो पशमीना में
पर-पीड़ा-प्रति अवकाश किसे है?
कौन जानता उस चीरू को?
जिसका केश-वसन तन ढँकता ।
जब आभास नहीं है दिनकर
कब उगता है कब ढलता ।
चीरू के निश्छल नयनों का
कर्मठ तन्तुवाय हस्तों का,
भान किसे है, ज्ञान किसे है?
चन्देरी बुनते हाथों के
करघे पर चलते हाथों के,
परि मान-सम्मान किसे है?
कौन जानता है कितने
कष्टों में वो जीते होंगे ?
कौन जानता है कैसे वे
कलित कसीदा सीते होंगे ?
सौन्दर्य और कष्टों का ऐसा
विलक्षण-संयोग कहाँ होगा ?
चर्वणा करे इस रस का
किसने कष्ट सहा होगा?
वेदना का ज्ञान नहीं तो
संवेदना भला क्या होगी?
उपभोगों से बद्ध हृदय में,
करुण-चेतना क्या होगी ?
 
जुलाई अंक
ममता त्रिपाठी
नई दिल्ली

Friday, July 19, 2013

सितारों की महफिल................हरप्रीत कौर




सितारों पर चढ़ने की ख़्वाहिश लिए बैठी थी एक बादल पर,
बादल में कितने छिद्र थे पता नहीं था अब तक,
तेज हवा आई सब कुछ ले गई,
न ही रहा बादल और न ही रही सितारों की महफिल।
महफिल जो मदहोश थी,
कामयाबी की वो डोर थी,
उजियाला और सुहाना समा था,
निराशाओं का तूफान वहाँ थमा था ।
सितारों की चमक का अन्दाज़ा न था मुझे,
पर आँधियों का भवंडर छोड़ता है किसे,
न ही सितारे न ही चाँदनी,
तन्हाइयों में कोई बात भी कैसे बनती ।
पर मन नहीं माना,
उसे अपना नहीं बल्कि अपनों के लिए था कुछ कर दिखाना,
आत्मा की एक आवाज़ आई,
उसने फिर सितारों पर चढ़ने की गुम्हार लगाई ।
रात दिन एक हुए,
भूख प्यास तृप्त हुई,
एक टिमटिमाती रोशनी आई,
और लगा सितारों की महफिल मेरे दिल में उतर आई ।
जुलाई अंक

हरप्रीत कौर
लुधियाना, पंजाब

Saturday, June 29, 2013

माँ, काश! मैं लड़का होती ….. हरप्रीत कौर

माँ, काश! मैं लड़का होती
भँवरो की तरह घूमती,
मस्त पवन में झूमती,
रात के अंधेरों से न डरती,
काश! मैं लड़का होती |
माँ ! अगर मैं लड़का होती,
तो दादी कितनी खुश होती,
लड्डू बटते, ढोल बाजे पिटते,
गली गली में माँ ,तुम्हें दुआएँ मिलती |
माँ ! अगर मैं लड़का होती,
तो मस्ती से मैं स्कूल जाती ,
देरी की चिंता तुम्हें न सताती ,
जीन्स और शर्ट में बाहर घूमती,
न बुरी नज़र लगती और सितारों को मैं चूमती |
माँ ! अगर मैं लड़का होती,
तो ट्यूशन रात को भी चली जाती,
न ही होता मेरा होस्टेल बंद,
बिल्कुल बिंदास, मुझे क्या डर ?
माँ ! अगर मैं लड़का होती,
तो नौकरी के लिए दूर भी चली जाती,
न रहने की चिंता और दोस्तों का साथ,
नौकरी की खुशी और घर लगता बड़ा पास |
माँ ! अगर मैं लड़का होती,
तो न झेलने पड़ते प्रमोशन के लिए शोषण,
बसों में न पड़ते बेफिजूल धक्के,
और न ही रेल में स्पेशल लेडिज कंपार्ट्मेंट |
माँ ! अगर मैं लड़का होती,
तो दहेज की चिंता तुम्हें न सताती,
न सास के ताने सुनती और न दहेज की बलिचढ़ जाती,
काश! मैं लड़का होती |
माँ ! अगर मैं लड़का होती,
मोटरसाइकल के चक्कर जरूर लगाती,
और लड़कियाँ देखकर,
ताने या सीटियाँ नहीं बजाती|
माँ, उन्हें मैं इज्जत देती,
हमारी बहनें ,बेटियाँ और माँ हैं,
इतनी सहनशक्ति और धैर्यता,
वे लड़कियाँ नहीं देवी माँ हैं |
माँ, उनका मैं सम्मान करती ,
भला अपनी माँ, बहन या बेटी को भी कुछ कहता है ?
हर व्यक्ति अगर यही सोचे ,
तो समाज दुष्कर्मों से बचता है |
मत करो नारी जाति का अपमान,
यह पाप और हमेशा खतरे में है उनके प्राण,
मत नोचों, मत बाँटो,
जानवरों की तरह इन्हें मत काटों,
हम भी है इंसान,
इस नरक से बचाने के लिए मुझे भी बना दे लड़का, हे भगवान !




 

जून अंक
                     हरप्रीत कौर
           लुधियाना, पंजाब

Saturday, June 22, 2013

माँ तुम... सौरभ कश्यप

माँ तुम महकती हो
घर में जलती धूप
और मसालों की सौंध से ज्यादा
प्रत्येक कोना घर का
तृप्त है तुम्हारी पावन अनुभुति से।
माँ तुम मीठी हो
गुझिया की मिठास
और मेवामिश्र केसर खीर से ज्यादा
प्रत्येक स्वादरहित तत्त्व
अनुप्राणित है तुम्हारी मधुरता से।
माँ तुम विराट् छत हो
कुटुम्ब की सार संभाल और...
पत्थर गारे की शरण से
ऊँची ज्यादा कहीं
हर प्रसन्नता घर की
सराबोर है तुम्हारे आश्रय से।
माँ तुम जगमगाती हो
खिड़की से आती किरणों की चमक
और दीयों की जगमगाहट से ज्यादा
हर अंधेरा घर का
प्रकाशित है तुम्हारी दीप्ति से।
माँ तुम आनंद हो
गर्मियों में छ्त की ठंडी नींद
और परीक्षा में अव्वल आने से ज्यादा
हर उत्सव आयोजन घर का
खिलखिलाता है तुम्हारे ही
आनंद प्रतिबिम्ब से।
माँ तुम सरल हो
आँगन में चलती चीटियों की कतारों
और लुकाछिपाई के खेल से ज्यादा
हर आड़ी टेढ़ी जटिलताएं घर की
सुलझी हुई है तुम्हारे तिलिस्म से,
तुम्हारे चमत्कार से माँ...।
जून अंक
 सौरभ कश्यप,
 बीकानेर, राजस्थान

Friday, June 14, 2013

एक सपना.. मुकेश कुमार मिश्र

 
हरियाली के बीच
प्रथम बार उसे
जब ईंट-पत्थर दिखा।
शनैः-शनैःखड़ी होती
इमारत दिखी
हृदय में विकास की
एक अलख जगी
आगे बढ़ने की
जीवन जीने की,
ललक जगी॥
उसकी आँखों में भी
एक सपना जगा
पर.................
जैसे –जैसे इमारत
ऊपर उठती गयी,
आकाश को छूती गयी,
उसका सपना
तार-तार होता गया।
जो कुछ .....
अबतक उसका था
धरती,
आकाश,
हवा ,पानी
और हरियाली
उस पर से भी
वह अधिकार खोता गया...
मुकेश कुमार मिश्र
जून अंक