Friday, September 5, 2008

मैं वसन्त हूँ और तुम हो कोकिला

तुम कहती हो कि
मुझे जानती नही
कैसे कह सकती हो तुम
कि मुझे पहचानती नही
पिचले कई बरसों के वसन्त से
मै तुम्हे जानता हूँ
तुम्हे और तुम्हारी
गतिविधियों को
मैं पहचानता हूँ
मै यह भी जानता हूँ
कि जनता के सामने
तुम्हारी रागिनी
शरमा जाती है
मैं यह भी जानता हूँ कि
तुम एकान्त प्रिया हो
मैं यह भी जानता हूँ कि
तुम मधुरकण्ठा हो
पर तुम मुझे नही जानती
मुझे नहीं पहचानती
सुनकर आश्चर्य होता है
कि जो जिससे जीता है
उसी जीवन को नही पहचानता
पहचानने से इन्कार करता है
मैं जानता हूँ कि
तुम्हारे जीवन
तुम्हारी रागिनी
तुम्हारे अस्तित्व का
आधार मैं ही हूँ
तुम मानों या न मानों
कैसे तुम कह सकती हो कि
मुझे नही जानती
मुझे नही पहचानती
सोचो ज़रा
विचारो ज़रा
कि क्या मेरे विना तुम्हारा
कुछ अस्तित्त्व हो सकता है
क्या मेरे विना तुम
वनों में
कुञ्जों में
वाटिकाओँ में
छिपकर अपनी मधुर कूक
छोड़ सकती हो?
क्या तुम मेरे विना अपनी
दस्तक नन्दनवन में दे सकती हो?
खैर ठीक है..........
यदि तुम नहीं जानती
नहीं पहचानती
तो मैं ही करवा देता हूँ
अपना अभिज्ञान
तो जानना चाहोगी कि मै कौन हूँ
सुनो.........
ध्यान से सुनना.....................
ताकि फिर कभी यह मत कहो
कि मैं नही पहचानती
समाधिस्थ हो सुनना
ताकि यह कभी न कहो
कि मै नहीं जानती
............................
मैं वसन्त हूँ
जिसके आने पर धरती
पुलकित होती है
वृक्ष प्रफुल्लित होते हैं
सभी प्रमुदित होते हैं
मैं वसन्त हूँ
जिसके आने पर तुम
मगन हो
निर्भय हो
कुञ्जों में बैठकर
कूँजती हो
क्योंकि मैं तुमको प्रदान करता हूँ
एकान्त कुञ्जों की शीतल छाया
मैं तुम्हे प्रदान करता हूँ
कुञ्जों से आने वाली
पुष्पोँ की सुगन्ध
अब कभी मत कहना के मैं नही पहचानती
मैं तुम्हार जीवन हूँ
तुम्हारे अस्तित्त्व का आधार हूँ
मैं वसन्त हूँ
और तुम हो कोकिला


कोसी का कोप

कोसी का कोप
इतना भयानक होगा
हमारी सरकार
अमारे नौकरशाहों नें
स्वप्न में भी
सोंचा नही होगा
तभी इस विपत्तिके
पूर्वानुमानों के बाद भी
उनकी कुम्भकर्णी निद्रा
भंग नही हुई थी
वे काग़ज़ों के ढ़ेर में
मुलायम तकियों का सहारा ले
शुतुर्मुर्गी समाधान ढ़ूढ़ रहे थे
और जब
बिहार डूब रहा है
वहाँ तबाही मची है
त्राहि माम् त्राहि माम्
का करुण स्वर
सर्वत्र वातावरण में
गूँज रहा है
जब जन-धन-स्थल
सब दूब रहा है
तब वे शाक्ड हैं
कह रहे हैं
क्या हो रहा है
मुझे तो इसका अन्दाज़ा
ही नही था
और सब चीजों
में तो अमेरिका की नकल
करनें में हम
सबसे आगे हैं
या यो कहें कि
अमेरिकन से भी
आगे हैं
पर किसी अच्छी चीज़ की
नकल के समय
हमारी बुद्धि
कुंद क्यों हो जाती है
हम अच्छाई की
नकल क्यों नही करते?
आज यदि हम
उसकी नकल किये होते
उसके पदचिह्नों
पर सचमुच चले होते
उसकी अच्छाइयों को
आत्मसात् किये होते
तो................
जैसे उसने गुस्ताव से बचाव किया
वैसे हम भी
बचाव के उपाय किये होते
कमसे कम इत्नी तबाही से तो
बच गये होते

Thursday, September 4, 2008

युवा पीढ़ी और मैं

स्मृतियाँ मेरे इर्द-गिर्द घूमती हैं
स्टेज शो करती हैं
कैटवाक करती हैं
मेरी आँखे विस्मय से
उन्हें देखती रह जाती हैं
देखते-देखते पता नही कहाँ
शून्य में खो जाती हैं
तब यकायक मैं अपने तज़ुर्बे
और अपने ज़माने पर उतरता हूँ
मेरे दिमाग में कौंधती है तब
मेरे अपने समय की यादें
मेरा अपना अतीत
अतीत की आनन्ददायाक गतिविधियाँ
और तब मैं करने लगता हूँ
वर्तमान और अतीत की तुलना
करने लगता हूँ
समय के साथ हुए परिवर्तनों की गणना
तब मुझे इन युवाओं की
कुछ गतिविधियाँ शूल सी चुभती हैं
मेरे अन्तस् को कचोटती हैं
मुझे व्यथित कर जाती हैं
और मेरा दिमाग चकरा जाता है
कि ये सब क्या हो रहा है
मेरे समय में
हम ऎसे तो नहीं थे
मुझे युवाओं की सब दलीलें
समय की माँग के नाम पर
वे जो देते हैं
फूटी आँखों नही सुहाती
मेरे जिह्वा पर नाचने लगते हैं
इनके विरोध के शब्द
मैं मौन नही रह पाता
भँग करके अपने मौन को
इनको समझाने लगता हूँ
पर जब मैं देखता हूँ
कि मेरे करोड़ो शब्दों के उपदेश के बाद
भी हालात कुछ सुधर नहीं रहे
तो हारकर मौन हो जाता हूँ
और परिस्थितियों के अनुरूप
अपने को ढालकर जीता रहता हूँ
क्योंकि युवा पीढ़ी से मैं मज़बूर हूँ
उनको मै सुधार तो नही सकता
पर उनकी बातों
उनकी गतिविधियों
उनकी कार्यशैली को
नज़रान्दाज़ तो कर सकता हूँ
सोंचता हूँ
उन्हें उनके हाल पर छोड़ दें
समय उन्हें सब कुछ सिखा देगा।

अति कोई नहीं सह सकता

कलकल बहती
छलछल बह्ती
निशिदिन है जो चलती रहई
मानसर से मिलती रहती
वो है सरिता
अनवरत्
विना रुके
विना थके
जो चलती रहती
वो है सरिता
मनवता को जीवन देती
प्रकृति में जीवन भरती
वो है सरिता
वृक्षों का सिंचन करती
धरती को उर्वर करती
वो है सरिता
प्यास बुझाती
हर प्यासे हा
भेदभाव वह तनिक न करती
जो निशिदिन है चलती रहती
वो है सरिता
गिरि गह्वर से
सतत प्रवाहमान
कभी नहीं जिसको अभिमान
सेवा करती मानवता का
नही कोई प्रतिकर लेती
वो है सरिता
पर मानव
अत्याचारी हो
करता रहता जिसका शोषण
करता निशिदिन जिसका दोहन
पर सदियों तक उफ़
तक न जो करती
वो है सरिता
शोषित हो कर भी जो जीवित
तनिक नही जो हुई कुपित
वो है सरिता
सदियों तक जिसका जल सोखा
जिसको दिया हमेशा धोखा
पर जिसनें अपना प्रवाह न रोका
रही अनवरत् बहती
वो है सरिता
पर……
अति होने से प्रलय है आता
प्रलय आने से
परिवर्तन होता है
परिवर्तन होने से
ताण्डव नर्तन है होता
आकिर वह भी कब तक सहती
अनवरत् शान्ति से बहती
वो है सरिता
आज मानवों के अत्याचारों से
उसके क्रूरतम व्यवहारों से
कुपित हो वह
धारण कर चुकी है
रौद्र रूप
विकराल स्वरूप
देखो वह है अट्टाहास करती
वो है सरिता
पर…………..
इस कार्य पर
हमें दुःख हो रहा
क्यों हो रहा है
इसलिये नहीं कि
उसने रौद्र रूप क्यों धारण किया
नही करना चाहिये था
वह और अत्याचार सहती
वो है सरिता
हमें दुःख सिर्फ़ इसलिये हो रहा है
कि उसने
निर्दोषों पर कहर बरपा
निर्दोषों को ही
अपना रौद्र रूप दिखाया
दोषी तो आज भी
एयर कण्डीशनरों में बैठे
मज़ा ले रहे हैं
उनके किये का सज़ा
निर्दोष भुगत रहे हैं
जब प्रकृति भी डरती है
कोप करनें को
दोषियों पर
सज़ा देने को
दोषियों को
तो मानव- निर्मित न्यायालय के
न्यायाधीश किसी
मालदार चिड़िया को
सज़ा देने में क्यों न डरें?
उन्हें तो डरना ही चाहिये
पर यदि मानव
स्वयं को
प्रकृति विजेता मानता है
तो न्यायाधीशों को
बिल्कुल नही डरना चाहिये
निर्भीक हो
दोषियों को
सज़ा सुनाना चाहिये
जैसे कल
बी एम डब्ल्यू रन एण्ड हिट काण्ड में
दोषियों को सुनायी गयी है
प्रकृति यदि दोषियों को
सज़ा नही दे सकती
तो उस पर विजयी मानव को
अवश्य सज़ा देनी चाहिये
तभी इस विजय की कोई
सार्थकता होगी।
अन्यथा हर गली में
ताण्डव मचेगा
और मचाने वाली
वही होगी
जो है सरिता
क्योंकि अति
कोई नही सह सकता ।

नज़रों को नीचा कर

अकाश में उड़ते पक्षियों के परों से कभी मत खेलना
क्योंकि उन परों में तुम सी शक्ति नही
पर उनकी आहों मे शक्ति है
आहों की शक्ति राख कर देगी
राजमहलों के कंगूरों को भी
इसीलिये गनीमत इसी में है कि
अपनी नज़रों को नीचा कर
अपने रास्ते पर चला करो
क्योकि उनको तुम्हारा
इधर-उधर देखना रास नही आता।

हम इस सदी के मानव हैं

प्रकृति कठपुतली है
हमारे हाथों की
यह क्रान्ति आ रही है
हमारे बातों की
हम गर्व से देखे जाते हैं
महफिल में सराहे जाते हैं
हम इस सदी के मानव हैं
दुनिया टिकी है
हमारे कन्धों पर
पर हमें कोई दर्द नही होता
क्योंकि………………
दर्द की अनुभूति के लिये
भावनायें चाहिये
और हमारी भावनाओं का
कत्ल कर दिया है
हमारे “ सभ्य पूर्वजों” नें
जानना चाहते हो
कि वे कौन हैं
जिन्होंने कत्ल किया
हमारी भावनाओं का
सभ्यता की दुहाई देकर
प्रगति की दुहाई देकर
यदि हाँ तो सुनो
वे हैं…..
रेने देकार्ट और न्यूटन
तथा उनके अनुयायी
जिन्होंने छीन ली हमारी मौलिकता
और दे दी हमको
थोपी हुई कृत्रिमता
जिन्होंने छीन लिया
हमारे बचपन की
बाललीलाओं को
और बना दिया हमें
“जाब ओरियन्टेड”
सारी प्रकृति को
हमारे कदमों में रखने का
स्वप्न दिखाया हमें
पर रह गये “ढाक के तीन पात”
अब उनकी कृपा का यह
सुपरिणाम होगा
कि कोई बालक
कभी कृष्ण सा माखनचोर
नही बन पायेगा
न कोई पुत्र
राम सा आज्ञाकारी
हो पायेगा
क्योंकि ये सब “टाइम वेस्टिंग” है
जब जाब की टेंशन है
तो टाइम बचाना है
अन्यथा अरबपतियों की सूची में
नाम कैसे हो पायेगा
अगर छोटी उम्र में
कहीं काम न मिले
तो थोड़ी सी कलाकारी दिखाकर
फिल्मों में तो एक्टिंग
किया ही जा सकता है
किसी रियलिटी शो में तो
भाग लिया ही जा सकता है
अधिक पढाई से भी क्या होगा
वो तो बुद्धजीवियो का काम है
हमकों तो
मल्टीनेशनल कम्पनियों को ही देखना है
अतः कोई
प्रोफेशनल कोर्स ही कर लेते हैं
हमे बुद्धजीवी बनकर
लोकमंगल से क्या काम
उससे हमारा पेट
थोड़े ही भरेगा
न ही हमारा नाम
अरबपतियों की लिस्ट में होगा
बुद्धजीवी तो
बाद में भी बना जा सकता है
क्योंकि पैंसे में
विश्व स्तर का बुद्धिजीवी बनाने की
ताकत तो है ही
तो क्यो न पैसा बनाया जाये
इसीलिये………
हमारी भावनाओं को
मार दिया गया है
और इसीलिये
हमारे कन्धों पर जो भार है
उससे हमें दर्द नही होता
क्योकि दर्द के लिये भावनायें चाहिये
हमें दूसरे से क्या लेना
कहीं सूखा पड़े,
कहीं बाढ़ आये
कहीं तूफान आये
कहीं हत्या हो
कहीं लूट हो
कहीं डकैती हो
कहीं बम फूटे
हमारे सीनों मे हलचल नहीं होती
क्योंकि किसी हलचल के लिये
भावनाएँ चाहिये
जो मर चुकी हैं
मरकर दफ़न हो चुकी हैं
हाँ
यदि ज़रूरी हो तो हम
घड़ियाली आँसू बहा सकते हैं
आँसुओं के लिये प्याज़ व ग्लिसरीन
अपनी आँखों में लगा सकते हैं
या और कोई
हार्मलेस हथकण्डा भी आज़मा सकते हैं
क्योंकि हम इसके आदी हैं
पर ऎसा हम हमेशा नही करेंगे
ऎसा हम तभी करेंगे
जब हमारा लाभ होगा
क्योंकि बिना लाभ के
हम कुछ भी नही करते

Monday, September 1, 2008

एक शब्द

आशा ही
मेरे जीवन की परिभाषा है
बस यही शब्द मेरे जीने की आशा है
एक शब्द भी दे सकता है
जीवन
सिखा सकता है
जीवन का राग
भर सकता है
जीवन में अनुराग
और उसमें
फूलों की सुगन्ध बसा सकता है
एक शब्द
एक शब्द ही तो है आशा
जिसके सहारे जीवन चला करता है
हारना भी एक शब्द ही है
जीतना भी एक शब्द ही है
शब्द ही है दुःख और सुख
शब्द ही है हास और रुदन
शब्द ही है जीवन की जीवन्तता
शब्द का अस्तित्व ही अनुभूति है
हमारे होने का
शब्द का अस्तित्व ही प्रतीति है
हमारे जीने का
शब्द ही भय है
शब्द ही साहस
अन्यथा..........
निःशब्द से भला कोई
डरता है
शब्द ही शासन करता है
शब्द से ही शासन चलता है
आशा और विश्वास सब तो शब्द ही हैं


तो..................................
आइये हम
शब्द का संधान करें
शब्द की साधना करें
शब्द की अर्चना करें
शब्द की वन्दना करें
शब्द की आराधना करें