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Thursday, September 11, 2008
कल तलक उनका बड़ा शोर था
हर तरफ़ उनके नाम का ही रोर था
कोई नही जानता था बात क्या है?
आखिर उनकी बिसात क्या है?
पर...........
जब एक दिन सीबीआई का
छापा पड़ा उनके घर
जब सूखने लगे "उनके" अधर
तब सबको समझ में आया
कि आखिर बात क्या है
उनकी ये बिसात क्या है
बसती हैं ऎसे लोगो के घर लक्ष्मी
आखिर इसकी बात क्या है
पर...............
लोगों ने यह भी देखा कि
लक्ष्मी का बसना कुछ भी नही होता
बिसात से भी कुछ नही होता
जब न्याय के प्रहरी सजग होते है
जब अत्याचार के पलड़े भारी होते है
तब ये लक्ष्मीपति सीबीआई को
द्वार पर देख कर बगलें झाकने
लगते हैं
तब इनका तथाकथित स्वाभिमान
धारा रह जाता है ।
यह स्वाभिमान मात्र
गरीबों को दिखाने के लिये होता है
जो नहीं जानते हैं इनकी हकीकत
या जानते हिए भी जाना नहीं चाहते
अलग कहीं के लिये
इनके पास स्वाभिमान जैसी
कोई चीज़ नही होती
पर इसका भी पोल
तब खुल ही जाता है
जग-जाहिर हो ही जाता है जब
सीबीआई द्वार पर होती है
कोई बड़ा रार छिड़ा होता है
जब वो तकरार पर उतरती है
तब इनका चेहरा नीचा होता है
शर्म से
ग्लाने से
या फर्जी स्वाभिमान की
पोल खुलने से हुई बदनामी से
तब पता चलती है इनकी बिसात
और आज अर्धशतक बाद जब होते हैं उसी घाटी में धमाके
सूरज की किरणें
अपनी सुनहली आभा
बिखेर रही थीं
सहसा क्या हुआ
भर गया गगन
धूल के कणों से
पक्षियों के शोर से
खो गयीं सूरज की
रुपहली किरणें
जिन्हें देखते थे लोग
अपनें मकानों के अन्दर से
उन किरणों के खोने से
भयभीत लोग
क्या हुआ-क्या हुआ की
रट लगाये
चिल्लाते
सड़कों पर
स्तब्ध घूम रहे थे
सबकी निगाहे
भयभीत हो
एक-दूसरे को आश्वासन दे रही थी
आश्चर्य से भरे थे लोग
कि सहसा क्या हुआ
कहाँ खो गयी सूरज की रोशनी
कैसे छा गयी ये बारूदी धुन्ध
और...........
आज..............
अर्धशतक बाद
जब होते हैं......
उसी घाटी में.......
धमाके...............
जब धुन्ध छाती है
सूरज की किरणों पर
तब किसी को
नही होता
कोई आश्चर्य
क्योंकि आज वहाँ की
हवा
सूरज
सूरज की रोशनी
रात का अँधियारा
वहाँ के लोग
बच्चे
बूढ़े
जवान
सभी
बारूद के इन धमाकों को
सुनने के
अभ्यस्त हो गये हैं
अब किसी को इनसे
कोई आश्चर्य नही होता
Tuesday, September 9, 2008
उन पर अलगाववाद के बीज बोये जा रहे हैं
भावनाए भड़क रही हैं
भाषावाद की चिमनियाँ
सुलग रही हैं
वोट बैंक के लालच में
विषबेल जो
पनप रही है
धीरे-धीरे-धीरे जो
कंगूरे पर चढ़ रही है
कल क्या जाने
दृश्य दिखायेगी वह
क्या जाने कल क्या
रूप लेकर आयेगी वह
महाराष्ट्र में कभी
ठाकरे चिल्लाता है
कभी माओवाद
अपने गले फाड़ता है
कभी नक्सलवादी करते हैं
नक्सलवाद ज़िन्दाबाद
खड़े होकर
भारत के सीने पर
आज........................
देश का चाहे जो कुछ भी हो
चाहे वो स्वाहा भो जाये
चाहे उसकी हवन हो चाहे
चाहे उसे कफन मिल जाये
चाहे वो मिट्टी में मिल जाये
चाहे धूल-धूसरित हो जाये
राजनीति के कारण
कोई उसकी परवाह नही करेगा
चाहे क्यों न भारत पुनः गुलाम हो जाये
इस अखण्ड देश में
भाषायी विविधता
के बावजूद भी
राष्ट्रीय एकता
पलती थी
भाषा अलग होकर भी
भूषा अलग होकर भी
अन्तस् की भावनाएँ मिलती थीं
पर आज उन भावनाओं को
गरम जल से सींचकर
उन पर अलगाववाद के बीज बोये
जा रहे हैं
Monday, September 8, 2008
पर नदियाँ क्या करे वे तो स्वयं त्रस्त हैं
नदियाँ मिलती थीं
हँसती खिलखिलाती
कभी-कभी समुद्र भी मिल जाते थे
इन नदियोँ की ज़्यादती से परेशान
इनकी ढिठाई से वे रहते थे हैरान
उनकी व्यथा-कथा भी कुछ और थी
सदियों से वे सह रहे थे नदियों की
प्रताड़ना
झेल रहे थे अपार वेदना
पर कभी कुछ नही थे कहते
रहते थे हमेशा सहते
पर.............................
जब नदियों ने सारे ज़हाँ का
कूड़ा-करकट
धरती की सारी मैल
बहाकर
समुद्र के सीने पर पटकनें लगीं
तब भी समुद्र कुछ नहीं बोला
उसने सोचा कि
शायद ये नदियाँ
अपने इस ओछी हरकत से
सम्हल जायें
मेरी हालत देख कर
अपनी गतिविधियों से
बाज़ आयें
वह देखता रहा
कुछ दिन और
सुधार के सपने बुनता रहा
कि मेरी प्रेयसी
सुधर जायेगी
और अपने इस
अतिक्रमण से बाज़ आयेगी
वह कुछ दिन देखता.......................
पर जब उसने देखा कि
उसकी सहनशक्ति
ज़बाब दे रही है
और नदी अति कर रही है
तब उसने भी
नदियों द्वारा लाया सारा
कूड़ा-करकट
नदियों को
धरती को
पृथ्वी वासियों को
कल कारखानों के मालिकों को
सरकार को
वापस देने के लिये
वर्षों से अपने
खौलते खून को
वर्षों से अपने
उबलते खून को
धरती पर बहा दिया
नदियों को भी
मिट्टी में मिला दिया
सबको उनके मुँह की
खिला दिया
तोड़कर अपने
गाम्भीर्य को
अपना रौद्र रूप दिखा दिया
उसने यह रूप स्वेच्छा से
नही दिखाया बल्कि
उसे बाध्य किया गया
लोगों द्वारा
लोगों की गतिविधियों द्वारा
नदियों की गतिविधियों द्वारा
पर नदियाँ क्या करे वे तो स्वयं त्रस्त हैं
इसीलिये शायद
समुद्र उन्हें आज तक
क्षमा करता रहा
सारे भार को स्वयं सहन करता रहा ।
Friday, September 5, 2008
चाँदनी रात की हँसी हमें भाती नहीं
चाँदनी रात की हँसी हमें भाती नहीं
जब तक हामारे खेमे में अँधेरा है
हमें पूर्णिमा बिल्कुल सुहाती नहीं
जब तक अमावस्या का अँधेरा है
बातें बनाने से कुछ नही होगा
जब तक हम हकीकत पर उतर न आयें
तुम्हें आजमाने से कुछ नही होगा
जब तक हम स्वयं निखर न आयें
मात्र राहत दिलाने से कुछ नही होगा
जब तक सामग्री मेरे घर न आये
कभी- कभी हमें भी कुछ "पूजा" चढ़ाया करो।
उड़ गये
ये अन्याय करना
तुमने कहाँ से सीखा
वाह जी नायाब है
तुम्हार ये तरीका
कभी पकड़ में
तो आ जाया करो
हमारे हाथों अपनी जान
कभी-कभी गँवाया करो
तुम रोज़ हमारा खून चूसते हो
चूसकर भाग जाते हो
कभी अपनी शहादत भी
दे दिया करो
वरना जानते हो
हम मानव हैं
तुमसे भी खतरनाक है
जब हम काटेगे तो
तनिक पता भी न चलेगा
तुम क्या तुम्हारे वंशजों का भी
सत्यानाश हो जायेगा
अतः गनीमत इसी में है कि
कभी- कभी हमें भी
कुछ "पूजा" चढ़ाया करो।
काश आकाशीय पक्षियों की तरह मेरे भी पर होते
काश आकाशीय
पक्षियों की तरह
मेरे भी पर होते
मैं भी आकाश में उड़ सकता
मै भी आकाश से बातें कर सकाता
मैं भी पूरी धरती देख सकता
मैं भी घोसलों में
रह सकता
मैं भी पक्षियों के खाद्य खा सकता
तो कितना अच्छा होता
शान्ति से तो जी सकता
शान्ति से तो रह सकता
घर बनाने का कोई झंझट
नही होता
घोसले में ही सो सकता
पैसे बटोरने की कोई चिन्ता नही होती
सन्तोष से जी सकता
मानवों की बात नहीं सुनता
सुनकर भी नज़र अन्दाज़ करता
तब मेरे कितने मज़े होते