तुम कहती हो कि
मुझे जानती नही
कैसे कह सकती हो तुम
कि मुझे पहचानती नही
पिचले कई बरसों के वसन्त से
मै तुम्हे जानता हूँ
तुम्हे और तुम्हारी
गतिविधियों को
मैं पहचानता हूँ
मै यह भी जानता हूँ
कि जनता के सामने
तुम्हारी रागिनी
शरमा जाती है
मैं यह भी जानता हूँ कि
तुम एकान्त प्रिया हो
मैं यह भी जानता हूँ कि
तुम मधुरकण्ठा हो
पर तुम मुझे नही जानती
मुझे नहीं पहचानती
सुनकर आश्चर्य होता है
कि जो जिससे जीता है
उसी जीवन को नही पहचानता
पहचानने से इन्कार करता है
मैं जानता हूँ कि
तुम्हारे जीवन
तुम्हारी रागिनी
तुम्हारे अस्तित्व का
आधार मैं ही हूँ
तुम मानों या न मानों
कैसे तुम कह सकती हो कि
मुझे नही जानती
मुझे नही पहचानती
सोचो ज़रा
विचारो ज़रा
कि क्या मेरे विना तुम्हारा
कुछ अस्तित्त्व हो सकता है
क्या मेरे विना तुम
वनों में
कुञ्जों में
वाटिकाओँ में
छिपकर अपनी मधुर कूक
छोड़ सकती हो?
क्या तुम मेरे विना अपनी
दस्तक नन्दनवन में दे सकती हो?
खैर ठीक है..........
यदि तुम नहीं जानती
नहीं पहचानती
तो मैं ही करवा देता हूँ
अपना अभिज्ञान
तो जानना चाहोगी कि मै कौन हूँ
सुनो.........
ध्यान से सुनना.....................
ताकि फिर कभी यह मत कहो
कि मैं नही पहचानती
समाधिस्थ हो सुनना
ताकि यह कभी न कहो
कि मै नहीं जानती
............................
मैं वसन्त हूँ
जिसके आने पर धरती
पुलकित होती है
वृक्ष प्रफुल्लित होते हैं
सभी प्रमुदित होते हैं
मैं वसन्त हूँ
जिसके आने पर तुम
मगन हो
निर्भय हो
कुञ्जों में बैठकर
कूँजती हो
क्योंकि मैं तुमको प्रदान करता हूँ
एकान्त कुञ्जों की शीतल छाया
मैं तुम्हे प्रदान करता हूँ
कुञ्जों से आने वाली
पुष्पोँ की सुगन्ध
अब कभी मत कहना के मैं नही पहचानती
मैं तुम्हार जीवन हूँ
तुम्हारे अस्तित्त्व का आधार हूँ
मैं वसन्त हूँ
और तुम हो कोकिला
Friday, September 5, 2008
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